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रास्ता रोकने वाले

रास्ता रोकने वाले

चौक-चौराहों पर
फालतू में बैठे
कुछ लोग
चींटी का रास्ता भी
रोक देते हैं।

बस देखने के लिए —
“अब कहाँ से जाएगी?”

उन्हें मंज़िल से
कोई मतलब नहीं,
उन्हें सिर्फ़
रोकने में आनंद आता है।

चलती हुई चीज़
उन्हें चुभती है।
मेहनत करती हुई
उन्हें खटकती है।
किसी का आगे बढ़ना
उन्हें असुविधा देता है।

वे रास्ते नहीं बनाते,
पर रास्ते रोकते हैं।

वे सपने नहीं देखते,
पर सपनों पर
पत्थर ज़रूर रखते हैं।

और तुम सोचते हो
कि वे तुम्हें
यूँ ही आगे जाने देंगे?

नहीं।

जो चींटी को
नहीं जाने देते,
वो तुम्हें भी
आसानी से
नहीं जाने देंगे।

इसलिए
रुकना मत।

उनसे लड़ना भी मत।
बस रास्ता बदलना सीखो।

चींटी दीवार नहीं तोड़ती,
वो दिशा बदलती है।

और अंत में
पहुँचती वहीं है
जहाँ उसे पहुँचना होता है।

रास्ता रोकने वाले
हमेशा वहीं बैठे रह जाते हैं।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

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