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करोड़ों खामियाँ

करोड़ों खामियाँ

तुम्हें बस
लाख तक गिनती आती है,
और मुझमें
करोड़ों खामियाँ हैं।

तुम्हारी नज़र
साफ़-सुथरी चीज़ें ढूँढती है,
मैं तो धूल में भी
अपना सच छिपाए बैठा हूँ।

तुम हिसाब करते हो —
मैं महसूस करता हूँ।

तुम कहते हो —
“इतनी गलतियाँ?”
मैं कहता हूँ —
“इतनी कोशिशें।”

हर खामी के पीछे
एक गिरना है,
हर गिरने के पीछे
एक उठना है।

तुम्हें संख्या दिखती है,
मुझे सफर दिखता है।

तुम्हें दाग दिखते हैं,
मुझे ज़ख्मों की कहानी।

तुमने मुझे
तराज़ू पर रखा,
मैंने खुद को
आईने में देखा।

तुम्हारे पास
आँकड़े हैं,
मेरे पास
अनुभव।

हाँ,
करोड़ों खामियाँ हैं मुझमें,
क्योंकि
मैंने लाखों बार
कोशिश की है।

और जो कोशिश करता है,
वो बेदाग नहीं होता।

तुम लाख तक गिनो,
मैं सफर तक जीऊँगा।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता खामियों को कमजोरी नहीं, बल्कि प्रयासों की पहचान के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि बताते हैं कि जो व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करता है, उससे गलतियाँ भी होती हैं, और वही अनुभव उसे परिपक्व बनाते हैं।

यह रचना हमें सिखाती है कि दूसरों की आलोचना से अधिक महत्वपूर्ण अपनी यात्रा को समझना है। जो प्रयास करता है, वही गिरता है, और जो गिरता है, वही उठकर मजबूत बनता है।


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