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चुप कराए गए सच

चुप कराए गए सच

सच अब
धीरे बोलता है,
क्योंकि झूठ
माइक लेकर खड़ा है।

सच को
साबित होना पड़ता है,
झूठ को
बस दोहराया जाना होता है।

सच
तथ्यों में चलता है,
झूठ
नारों में दौड़ता है।

सच
धीरे-धीरे पहुँचता है,
झूठ
तेज़ी से फैलता है।

कभी अख़बार
सवाल पूछते थे,
अब हेडलाइन
निर्णय सुना देती है।

कभी खबर
जानकारी होती थी,
अब खबर
मत बन जाती है।

सच के पास
कागज़ होते हैं,
झूठ के पास
माइक।

और माइक
हमेशा ज़्यादा ऊँचा बोलता है।

भीड़
आवाज़ की तरफ़ जाती है,
सच्चाई की तरफ़ नहीं।

इसलिए
सच अब
धीरे बोलता है।

क्योंकि उसे पता है —
इतिहास
शोर नहीं सुनता,
सिर्फ़ सच्चाई याद रखता है।

और झूठ
जितना भी ऊँचा बोले,
अंत में
खामोशी में गिरता है।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता आधुनिक मीडिया और सूचना के दौर में फैलते शोर और प्रचार की संस्कृति पर प्रश्न उठाती है। जब झूठ को बार-बार दोहराया जाता है, तो वह अधिक तेज़ और प्रभावशाली दिखाई देता है।

कवि संकेत देते हैं कि सच्चाई को अक्सर समय और धैर्य की आवश्यकता होती है। इतिहास अंततः शोर नहीं, बल्कि तथ्य और सत्य को ही याद रखता है।


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