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मैं डिग्री वाला बेरोज़गार हूँ

मैं डिग्री वाला बेरोज़गार हूँ

मैं डिग्री वाला बेरोज़गार हूँ।

हाँ,
हाथ में डिग्री है,
जेब में खालीपन।

कभी सोचता हूँ,
कितनी मेहनत की थी मैंने…
रातें काटी थीं,
सिलेबस निगला था,
नोट्स घिसे थे।

तब सब कहते थे —
“बस पढ़ लो,
ज़िंदगी बन जाएगी।”

मैंने पढ़ लिया।
ज़िंदगी अभी भी
इंतज़ार में है।

दीवार पर टंगी है
मेरी डिग्री,
माँ रोज़ धूल साफ़ करती है,
जैसे उम्मीद
अब भी चमक सकती हो।

पापा पूछते नहीं,
पर पूछते हैं।
मैं जवाब नहीं देता,
पर देता हूँ —
चुप्पी में।

हर रिज़ल्ट के बाद
मैं खुद को समझाता हूँ —
“अगली बार।”
कितनी अगली बार
होती है ज़िंदगी में?

इंटरव्यू रूम में
मैं आत्मविश्वास लेकर जाता हूँ,
वापस आता हूँ
औपचारिक मुस्कान के साथ।

कभी लगता है
मेरी कमी है।
कभी लगता है
जगह कम है।

मैं निकम्मा नहीं हूँ।
मैं आलसी नहीं हूँ।
मैंने कोशिश की है।

पर सिस्टम
कोशिश नहीं गिनता,
सिफ़ारिश गिनता है।

हाथ में डिग्री है,
जेब में खालीपन।

और सबसे भारी
वही खालीपन है —
जो जेब में नहीं,
भीतर उतरता जा रहा है।

मैं डिग्री वाला बेरोज़गार हूँ।
और मैं
अब भी
हार नहीं मानना चाहता।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह एकालाप एक शिक्षित युवा की मानसिक और सामाजिक स्थिति को उजागर करता है। डिग्री होने के बावजूद अवसरों की कमी उसे आत्मसंघर्ष की स्थिति में डाल देती है।

कवि दिखाते हैं कि बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि भावनात्मक और आत्मसम्मान से जुड़ी चुनौती भी है। फिर भी अंत में आशा और प्रयास का भाव जीवित रहता है।


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