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खोखलापन जीवन

खोखलापन

खोखला जीवन, खोखली आश,
खोखला दम, खोखला विश्वास।

खोखले रिश्ते, खोखली प्यास,
खाली दारू की बोतल सा —
खोखला एहसास।

एक-एक घूँट में
खुद को भरने की कोशिश,
पर हर घूँट के बाद
और खाली होता इंसान।

पी तू ऐसे ही पी,
खुद को बहलाता जा,
हर बोतल के साथ
थोड़ा और टूटता जा।

खोखला जीवन, खोखली आश,
खोखला दम, खोखला विश्वास…

भीड़ में खड़ा होकर भी
तन्हा सा लगता है,
हँसी के पीछे
एक सन्नाटा बसता है।

आँखों में नशा है,
पर दिल में सूखा पड़ा है,
हर दिन जीता है
पर भीतर कुछ मरा पड़ा है।

रिश्ते अब
सिर्फ नाम के रह गए हैं,
साथ बैठते हैं लोग
पर दिल दूर रह गए हैं।

जो भरना था भीतर,
वो और खाली हो गया,
जो ढूँढ रहा था सुकून,
वो खुद से ही खो गया।

बोतलें खत्म होती रहीं,
पर प्यास नहीं,
नशा बढ़ता गया
पर विश्वास नहीं।

खोखला जीवन, खोखली आश,
खोखला दम, खोखला विश्वास…

कभी तो रुक,
कभी तो खुद को देख,
ये जो खालीपन है
यही तेरा सच है।

नशा तुझे भरता नहीं,
बस तुझे भूलाता है,
तू जितना भागता है,
उतना ही खो जाता है।

तोड़ दे ये चक्र,
छोड़ दे ये भरम,
वरना एक दिन
तू खुद ही बन जाएगा
एक खाली खोल…

जहाँ न दर्द होगा,
न कोई एहसास —
बस रह जाएगा
एक खोखला जीवन,
और खोखली साँस…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता नशे और मानसिक खालीपन की कठोर सच्चाई को सामने लाती है। कवि बताते हैं कि इंसान बाहर से चाहे कितना भी भरा हुआ दिखाई दे, लेकिन अंदर से वह धीरे-धीरे खोखला होता जाता है।

दारू की खाली बोतल यहाँ केवल एक वस्तु नहीं बल्कि एक गहरा प्रतीक है, जो यह दर्शाती है कि बार-बार बाहरी चीज़ों से खुद को भरने की कोशिश अंततः अंदर के खालीपन को और बढ़ा देती है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना सामाजिक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर गहरी चोट करती है। यह पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि सच्ची संतुष्टि बाहर नहीं बल्कि भीतर से आती है, और उससे भागना केवल खोखलेपन को बढ़ाता है।


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