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अहंकार का मकान

अहंकार का मकान

पाँच हज़ार स्क्वायर फीट का मकान है।
हम पाँच सौ में सिमटे हैं।
बाक़ी जगह में
चप्पल उतारकर
अहंकार घूमता है।

सीढ़ियाँ लंबी हैं।
साँस छोटी।

दीवारें
आसमान छूती हैं,
पर बातचीत
ज़मीन पर गिर जाती है।

झूमर जलते हैं
रात भर,
पर किसी ने
एक-दूसरे की आँखों में
रोशनी नहीं देखी।

कमरे बढ़ते गए।
कोने घटते गए।

डाइनिंग टेबल
आठ लोगों की है,
बैठते दो हैं —
बाक़ी कुर्सियाँ
सिर्फ़ लकड़ी हैं।

खिड़कियाँ बाहर खुलती हैं।
अंदर हवा नहीं आती।

हमने
संगमरमर खरीदा,
शायद
खामोशी सस्ती थी।

घर का नक्शा बड़ा है।
दिल का ड्रॉइंग छोटा।

बच्चों की हँसी
इको बनकर लौटती है।
दीवारें जवाब नहीं देतीं।

कोई पूछता है —
“कितने स्क्वायर फीट?”

कोई नहीं पूछता —
“कितने रिश्ते बचाए?”

यह मकान है।
घर नहीं।

घर वहाँ होता है
जहाँ दरवाज़े
धीरे से बंद होते हैं
और आवाज़ें
धीरे से खुलती हैं।

जहाँ जगह कम हो
पर लोग
एक-दूसरे में
फैलते जाएँ।

अहंकार जितना घटे,
घर उतना बसता है।

बाक़ी सब
नाप-तौल है।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता आधुनिक जीवन की विडंबना को सामने लाती है, जहाँ बाहरी वैभव और बड़े मकान भावनात्मक दूरी को ढक नहीं पाते। कवि संकेत देते हैं कि अहंकार अक्सर उस जगह को भर देता है जहाँ संवाद और अपनापन होना चाहिए।

सच्चा घर वही है जहाँ स्थान का माप नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट मायने रखती है। यह कविता हमें अपने भीतर झाँकने और मकान को घर बनाने की जिम्मेदारी याद दिलाती है।


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