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अमर प्रेम

अमर प्रेम

तेरी आँखों में मैंने
पहचाना है खुद को,
अजनबी नहीं तुम —
ये माना है तुमको।

तेरी दृष्टि में जैसे
अपना ही प्रतिबिंब पाया,
भीड़ भरी दुनिया में
तुझमें ही घर पाया।

सम्पूर्ण जीवन समर्पित,
तन-मन सब है तुम्हारा,
तुम पर जग क्या —
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मैं हारा।

तेरे प्रेम की गहराई में
मैंने स्वयं को खोया है,
और इसी खो जाने में
जीवन का अर्थ संजोया है।

अब सोच रहा हूँ क्या दूँ
जो अमर हो जाऊँ,
प्रेम पथ पर प्रिये
नई गाथा लिख जाऊँ।

शब्दों से नहीं,
सांसों से लिखूँ कहानी,
जहाँ हर धड़कन में
बस तुम्हारी निशानी।

मेरा प्रेम अमर रहा है,
यही रीत निभाना है,
तुम्हें इस जीवन में क्या —
हर जीवन में पाना है।

समय बदल जाए चाहे,
युग भी बदल जाएँ,
पर मेरा प्रेम
तुम तक ही लौट आए।

क्योंकि प्रेम वही सच्चा है
जो सीमाएँ न माने,
जो जन्मों की दूरी भी
एक पल में पहचानें।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता प्रेम के उस गहरे अनुभव को दर्शाती है जहाँ दो आत्माएँ एक-दूसरे में स्वयं को पहचान लेती हैं। यहाँ प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि आत्मिक समर्पण का प्रतीक है।

कवि यह बताना चाहते हैं कि सच्चा प्रेम समय, दूरी और जन्मों की सीमाओं से परे होता है। ऐसा प्रेम जीवन को अर्थ देता है और आत्मा को एक स्थायी पहचान प्रदान करता है।


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