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जिंदगी

जिंदगी

जिंदगी को कभी – कभी
अपने पन्ने खुद लिखने दो,
रोको मत, बह जाने दो,
खुद को, आकाश में,
जिंदगी को जिंदगी दे दो…

कभी हवाओं सा उड़ने दो,
कभी बादल सा बरसने दो,
जो थमा है भीतर कहीं,
उसे खुलकर धड़कने दो…

हर मोड़ पर हिसाब न माँगो,
कुछ लम्हों को यूँ ही जीने दो,
जो टूटा है, फिर जुड़ जाएगा,
वक़्त को अपना काम करने दो…

जिंदगी किताब नहीं केवल,
जिसे नियमों में बाँधा जाए,
ये तो नदी है बेपरवाह,
जिसे दिल से बस बहने दो…

कभी ख़्वाबों को सच होने दो,
कभी सच को ख़्वाब रहने दो,
सब कुछ पाने की जिद छोड़ो,
जो है, उसे ही रहने दो…

जिंदगी को कभी – कभी
खुद से भी आगे बढ़ने दो,
हर साँस में नया अर्थ भरकर,
जिंदगी को जिंदगी दे दो…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता जीवन को नियंत्रित करने के बजाय उसे महसूस करने का संदेश देती है। कवि कहते हैं कि जिंदगी को नियमों और भय में बाँधने के बजाय उसे स्वतंत्र रूप से बहने देना चाहिए। जैसे नदी अपने मार्ग स्वयं बनाती है, वैसे ही मनुष्य को भी अपने अनुभवों से अपना अर्थ गढ़ने देना चाहिए।

कविता यह भी सिखाती है कि टूटना, रुकना और बदलना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जो व्यक्ति जीवन को स्वीकार करता है और उसे खुलकर जीता है, वही वास्तव में जिंदगी को उसकी असली पहचान दे पाता है।


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