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माया, सत्य और आत्मबोध

माया, सत्य और आत्मबोध

यह जग माया का स्वप्न सलोना,
क्षणभंगुर हर रूप-खिलौना।
जो दिखता है, सत्य नहीं वह,
सत्य छिपा है अंतर-कोना।

धूप यहाँ छाया बन जाती,
छाया फिर प्रकाश कहलाती।
जीवन एक प्रवाह निरंतर,
लहर उठे तो लहर समाती।

मोह के बंधन जितने गहरे,
उतनी दूर शांति की धारा।
त्याग दीप जब मन में जलता,
दीख पड़ता सत्य सितारा।

समझ सको तो समझो प्राणी—
तुम ही पथिक, तुम्हीं पथ सारा।
आत्मबोध का द्वार खुला है,
बस पहचानो स्वर निज प्यारा।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता जीवन के गूढ़ सत्य को सरल और प्रतीकात्मक भाषा में प्रस्तुत करती है। कवि संसार को माया का स्वप्न बताते हुए यह संकेत देते हैं कि बाहरी रूप और आकर्षण क्षणभंगुर हैं, जबकि वास्तविक सत्य मनुष्य के अंतर में छिपा रहता है। धूप और छाया के माध्यम से जीवन की परिवर्तनशील प्रकृति को दर्शाया गया है, जहाँ हर परिस्थिति अस्थायी है और निरंतर बदलती रहती है।

कवि आगे बताते हैं कि मोह के बंधन मनुष्य को शांति से दूर ले जाते हैं, जबकि त्याग और आत्मचिंतन से सत्य का प्रकाश प्रकट होता है। अंतिम पंक्तियों में यह संदेश दिया गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपनी यात्रा का पथिक और पथ दोनों है; जब वह अपने भीतर के स्वर को पहचान लेता है, तब उसे आत्मबोध और वास्तविक शांति प्राप्त होती है।


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