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भीतर का विद्रोह

भीतर का विद्रोह

हम शांत हैं,
पर सहमत नहीं।

हमने शोर नहीं किया,
इसका मतलब
यह नहीं कि
हमने सब स्वीकार कर लिया।

कभी-कभी
चुप्पी भी
सबसे गहरा विरोध होती है।

भीड़
नारे लगाती है,
पर बदलाव
अक्सर भीतर से शुरू होता है।

हमने सवाल
दिल में रखे हैं,
और उत्तर
समय से माँगे हैं।

हम दीवारें नहीं तोड़ते,
हम सोच बदलते हैं।

क्योंकि
विचार जब बदलते हैं,
तो साम्राज्य
खुद गिर जाते हैं।

हम शांत हैं,
पर कमजोर नहीं।

हम चुप हैं,
पर अंधे नहीं।

हम देखते हैं,
समझते हैं,
याद रखते हैं।

और एक दिन
इतिहास लिखता है —

कि क्रांति
हमेशा शोर से नहीं,
विचार से होती है।

हम शांत हैं,
पर सहमत नहीं।

और यही
भीतर का विद्रोह है।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता उस मौन प्रतिरोध की शक्ति को दर्शाती है जो बिना शोर किए भी बदलाव की नींव रखता है। हर क्रांति हमेशा नारे और संघर्ष से नहीं, बल्कि विचार और जागरूकता से जन्म लेती है।

कवि संकेत देते हैं कि जब लोग शांत रहते हुए भी सहमत नहीं होते, तब भीतर एक नई सोच जन्म लेती है। यही विचार धीरे-धीरे समाज में परिवर्तन की दिशा तय करता है।


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