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झूठ का बाज़ार

झूठ का बाज़ार

झूठ आज इस मकाम पर
ऐसे नहीं पहुँचा,
क्योंकि सत्य चलता है
बहुत धीरे।

उसके चाहने वाले
होते हैं कम,
सच की राह पर
कदम भी
संभल कर पड़ते हैं।

सत्य को
सबूत चाहिए,
धैर्य चाहिए,
और समय भी।

पर झूठ को
सिर्फ़ आवाज़ चाहिए,
बस एक मंच,
और कुछ तालियाँ।

सच धीरे चलता है,
थकता नहीं,
पर जल्दी भी
नहीं पहुँचता।

झूठ दौड़ता है
बाज़ारों में,
गलियों में,
खबरों में,
और नारों में।

झूठ का तो
बाज़ार लगा है,
कुछ इधर
तो कुछ उधर।

हर कोई
अपनी-अपनी दुकान
सजा कर बैठा है,
और सच
अब भी
अपना रास्ता खोज रहा है।

सत्य की चाल
धीमी सही,
पर स्थिर होती है।

झूठ की रफ्तार
तेज़ सही,
पर टिकती नहीं।

क्योंकि अंत में
इतिहास
बाज़ार नहीं देखता,
वो केवल
सत्य को याद रखता है।

और जब
धूल बैठ जाती है,
शोर थम जाता है,
तब दिखाई देता है —

कि सच
भले देर से आया,
पर आया ज़रूर।

और झूठ
जो कभी
बाज़ार में चमक रहा था,
वो
किसी कोने में
चुप पड़ा है।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता आधुनिक समाज की उस विडंबना को उजागर करती है जहाँ झूठ तेज़ी से फैलता है और शोर के साथ बाज़ार में चमकता दिखाई देता है, जबकि सत्य धैर्य और प्रमाण के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।

कवि ने “बाज़ार” का प्रतीक प्रयोग करके यह दर्शाया है कि झूठ अक्सर प्रचार, भीड़ और आकर्षण के सहारे लोकप्रिय हो जाता है। इसके विपरीत सत्य को स्वीकार करने वाले लोग कम होते हैं, इसलिए उसकी यात्रा धीमी दिखाई देती है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि समाज में फैलते शोर और प्रचार के बीच सच्चाई को पहचानना कितना महत्वपूर्ण है। अंततः इतिहास उसी सत्य को याद रखता है जो समय की कसौटी पर टिकता है।


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