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प्यार की भीख मत माँगो

प्यार की भीख मत माँगो

मर जाना लेकिन,
प्यार की कभी
भीख मत माँगना।

प्यार भीख से नहीं होता,
नज़रों के झुक जाने से
दिल नहीं मिलते।

जबरदस्ती की नज़दीकी से
सुकून की दूरी
अच्छी होती है।

जो पास होकर भी
तुम्हें महसूस न करे,
उससे दूर रहना ही
बेहतर होता है।

भीख में मिला प्यार
प्यार नहीं होता,
वो बस
एक आदत बन जाता है —
जिसमें तुम खोते जाते हो
और सामने वाला
तुम्हें खोता जाता है।

अपने आप को
इतना सस्ता मत कर,
कि कोई भी
तुझे ठुकराकर
फिर बुला सके।

प्यार वो है
जो खुद चलकर आए,
जिसे मनाने की नहीं
बस निभाने की ज़रूरत हो।

जहाँ हर बार
तुम्हें ही झुकना पड़े,
वहाँ खड़े रहना भी
गलत है।

क्योंकि
सम्मान के बिना
कोई रिश्ता नहीं टिकता,
और आत्मसम्मान के बिना
कोई इंसान नहीं।

मर जाना लेकिन,
प्यार की भीख
कभी मत माँगना…

क्योंकि
जो तुम्हें चाहेंगे,
वो तुम्हें ढूँढ़ लेंगे,
और जो नहीं चाहेंगे —
उनके पीछे भागना
खुद को खो देना है।

तो छोड़ दे
हर वो दरवाज़ा
जहाँ तुझे रोककर नहीं,
तोड़कर रखा जाता है।

और याद रख —
प्यार माँगा नहीं जाता,
प्यार जिया जाता है…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता प्रेम में आत्मसम्मान की महत्ता को उजागर करती है। कवि स्पष्ट करते हैं कि भीख में मिला या जबरदस्ती का प्यार सच्चा नहीं होता, बल्कि वह व्यक्ति को धीरे-धीरे भीतर से कमजोर बना देता है।

कविता में “भीख” एक प्रतीक के रूप में सामने आती है, जो यह दर्शाती है कि जब इंसान अपने भावनात्मक मूल्य को कम कर देता है, तब वह संबंध भी खोखले हो जाते हैं।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक को यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम वही है जो स्वाभाविक रूप से आए और सम्मान के साथ निभाया जाए। आत्मसम्मान को बनाए रखना ही प्रेम की सबसे मजबूत नींव है।


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