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अलग रास्ता

अलग रास्ता

मैं कभी भीड़ में नहीं चला,
मुझे मालूम था
मैं उसमें कभी चल न पाऊँगा।

उस गुत्थम-गुत्था में
दब जाती मेरी चाल,
शोर में
खो जाती मेरी पहचान।

तभी मैंने
अलग रास्ता चुना —
जो था
भीड़ के बिना।

एकांत के साथ,
शून्य में मिलकर
चलता रहा निरन्तर,
अविकार।

क्योंकि वहीं
मैं स्वयं था।

उस रास्ते का दर्द
मेरा था,
उसकी ख़ामोशी
मेरी थी।

क्योंकि वह रास्ता
मेरा अपना था।

मैं कभी भीड़ में नहीं चला,
क्योंकि मुझे मालूम था —

हर मंज़िल
भीड़ से नहीं मिलती,
कुछ रास्ते
अकेले तय करने पड़ते हैं।

और वही रास्ते
अंत में
मनुष्य को
उससे मिलाते हैं
जो वह वास्तव में है।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता उस व्यक्ति की आंतरिक यात्रा को दर्शाती है जो भीड़ के साथ चलने के बजाय अपनी अलग राह चुनने का साहस करता है। कवि संकेत देते हैं कि कई बार समाज की भीड़ और प्रतिस्पर्धा व्यक्ति की अपनी पहचान को दबा देती है, इसलिए स्वयं को समझने और अपनी असली पहचान पाने के लिए एकांत का रास्ता चुनना आवश्यक हो जाता है।

इस कविता की संरचना सरल लेकिन गहरे प्रतीकों पर आधारित है। यहाँ “भीड़” केवल लोगों का समूह नहीं बल्कि उस सामाजिक प्रवृत्ति का प्रतीक है जो सभी को एक जैसी दिशा में चलने के लिए प्रेरित करती है। वहीं “अलग रास्ता” स्वतंत्र सोच, आत्मविश्वास और आत्मखोज की यात्रा का प्रतीक बन जाता है।

कवि श्रीकांत शर्मा ने इस रचना में एक शांत लेकिन दृढ़ स्वर का प्रयोग किया है। उनकी पंक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि सच्ची पहचान और आत्मिक संतोष अक्सर भीड़ से अलग चलने में ही मिलता है। यह कविता पाठक को प्रेरित करती है कि वह केवल भीड़ का अनुसरण न करे, बल्कि अपने भीतर की आवाज़ को पहचानकर जीवन की अपनी राह स्वयं बनाए।


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