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मौन — ईश्वर की भाषा

मौन — ईश्वर की भाषा

मौन ईश्वर की भाषा है,
इसको सुनने के लिए
मौन होना होता है।

शोर में दब जाती है
ईश्वर की आवाज़,
और हम समझते हैं
वो बोलते नहीं।

तुम्हारा बदलाव
शोर में आएगा नहीं,
मौन की भाषा सीखनी होगी
सुनने और समझने के लिए।

क्योंकि
जहाँ शब्द खत्म होते हैं,
वहीं से
ईश्वर बोलना शुरू करता है।

हर हलचल के बीच
एक ठहराव होता है,
और उसी ठहराव में
सत्य छुपा होता है।

तुम ढूँढ़ते हो
उत्तर बाहर,
जबकि वो
अंदर प्रतीक्षा में बैठा है।

पर अंदर जाने के लिए
शांत होना पड़ता है,
अपने ही विचारों से
थोड़ा दूर होना पड़ता है।

मौन सिर्फ चुप रहना नहीं,
मौन खुद को सुनना है,
वो सुनना
जो हमेशा से
तुम्हारे भीतर था।

जब मन थमता है,
तभी आत्मा बोलती है,
और जब आत्मा बोलती है —
तभी ईश्वर सुनाई देता है।

शोर तुम्हें
दुनिया से जोड़ता है,
मौन तुम्हें
स्वयं से जोड़ता है।

और जो स्वयं से जुड़ गया,
वो ईश्वर से
दूर नहीं रहता।

तो ठहरो,
कुछ पल
अपने भीतर उतर जाओ —

जहाँ कोई आवाज़ नहीं,
पर सब कुछ स्पष्ट है…

यही है
ईश्वर की भाषा।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता मौन के माध्यम से ईश्वर और आत्मा के गहरे संबंध को दर्शाती है। कवि बताते हैं कि जीवन के शोर में हम अक्सर उस सच्चाई को सुन नहीं पाते जो हमारे भीतर पहले से मौजूद होती है।

“मौन” यहाँ केवल चुप रहने का प्रतीक नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मबोध की स्थिति है। जब मन शांत होता है, तभी इंसान अपने भीतर की आवाज़ को सुन पाता है और वही उसे सच्चे मार्ग की ओर ले जाती है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक को भीतर झाँकने और जीवन की गहराई को समझने के लिए प्रेरित करती है। यह सिखाती है कि सच्चा परिवर्तन बाहर नहीं बल्कि भीतर की शांति से आता है।


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