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भीड़ में खामोश लोग

भीड़ में खामोश लोग

लोग सब देखते हैं,
पर बोलते नहीं।

गलत होता हुआ भी
उन्हें दिखता है,
पर होंठ
सिल जाते हैं।

डर से बड़ा
कोई वायरस नहीं।

यह हवा से नहीं फैलता,
यह नज़रों से फैलता है।
एक चुप्पी
दूसरी चुप्पी को जन्म देती है।

भीड़ खड़ी रहती है,
अन्याय गुजर जाता है।

कैमरे ऑन होते हैं,
आवाज़ ऑफ।

लोग कहते हैं —
“हमें क्या?”
और यही
सबसे खतरनाक वाक्य है।

सच सड़क पर गिरता है,
लोग किनारे खड़े रहते हैं।

कोई सवाल नहीं पूछता,
क्योंकि सवाल पूछना
खतरे में पड़ना है।

धीरे-धीरे
डर आदत बन जाता है।
और आदत
चरित्र।

फिर समाज
ज़िंदा दिखाई देता है,
पर भीतर से
मर चुका होता है।

क्योंकि
अन्याय से बड़ा अपराध
उस पर चुप रहना है।

लोग सब देखते हैं,
पर बोलते नहीं।

और इसी वजह से
डर
सबसे ताकतवर हो जाता है।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता समाज में व्याप्त खामोशी की संस्कृति को उजागर करती है। जब लोग अन्याय को देखते हुए भी बोलना बंद कर देते हैं, तब डर सबसे बड़ी शक्ति बन जाता है।

कवि संकेत देते हैं कि चुप रहना तटस्थता नहीं, बल्कि अन्याय की मौन स्वीकृति है। समाज की जीवंतता उसकी आवाज़ में होती है, और जब आवाज़ खो जाती है, तब भीतर की मृत्यु शुरू हो जाती है।


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