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दिशाहीन नशा

दिशाहीन नशा

नशा हो या प्यार हो,
अगर अंधा हो
तो आखिर में
बर्बाद ही करेगा।

भावनाओं का तूफ़ान
जब विवेक से दूर होता है,
तो जीवन की नाव
किनारों से भटक जाता है।

बिना मंज़िल की राह
अगर पकड़ ली जाए,
तो कदम चलते रहते हैं
पर दिशा खो जाती है।

पहले लगता है
सब आसान है,
पर धीरे-धीरे
जीवन उलझ जाता है।

नशा भी,
और अंधा प्यार भी —
दोनों अगर समझ से दूर हों,
तो इंसान को
तोड़ देते हैं।

क्योंकि
मंज़िल के बिना
चलती राह
अंत में
जीवन को
तार-तार कर देती है।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता जीवन की उन भावनाओं की चेतावनी देती है जो विवेक और दिशा के बिना चलती हैं। अंधा प्रेम हो या नशे जैसा आकर्षण, दोनों ही मनुष्य को रास्ते से भटका सकते हैं।

कवि यह संकेत देते हैं कि यदि जीवन बिना लक्ष्य और समझ के चलने लगे, तो शुरुआत भले आसान लगे, पर अंत में वही राह पछतावे और टूटन की ओर ले जाती है।


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