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पूरा जीवन

पूरा जीवन

हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन,
‘कम से कम’ वाली बात
जमती नहीं हम पर।

आधा सच,
आधा सपना,
आधा जीना —
ये सब हमें मंज़ूर नहीं।

हम तो पूरा आसमान चाहेंगे,
चाहे पंख टूट जाएँ,
पर उड़ान अधूरी
कभी नहीं रखेंगे।

कम में खुश रहना
सीखा नहीं हमने,
और झूठी तसल्ली से
दिल बहलाना भी नहीं।

जो मिलेगा
पूरा चाहिए,
और जो नहीं मिलेगा
उसे पाने का जज़्बा चाहिए।

हम ठहरने वालों में नहीं,
हम रुकने वालों में नहीं —
हम तो वो हैं
जो हर सीमा को
पार करने निकलते हैं।

ज़िंदगी अगर दी है
तो पूरी जीनी है,
हर रंग, हर दर्द,
हर खुशी को
छूकर जीनी है।

क्योंकि ‘कम से कम’ में
न जीवन बसता है,
न आत्मा तृप्त होती है।

हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन,
हर साँस, हर पल,
हर एहसास —
पूरा जीकर ही रहेंगे।

और अगर हार भी गए
तो क्या हुआ —
कम से कम ये तो कह पाएँगे
कि हमने जीवन
पूरा जिया था।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता जीवन को पूरी तरह जीने की प्रेरणा देती है। कवि “कम से कम” की मानसिकता को चुनौती देते हुए यह बताते हैं कि अधूरे सपनों और सीमित इच्छाओं में सच्चा जीवन नहीं बसता।

यहाँ “पूरा जीवन” केवल अधिक पाने की इच्छा नहीं बल्कि हर अनुभव को गहराई से जीने का प्रतीक है। चाहे वह खुशी हो या संघर्ष, दोनों को स्वीकार करके ही जीवन का वास्तविक अर्थ समझा जा सकता है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक के भीतर साहस और विस्तार की भावना जगाती है। यह कविता सिखाती है कि जीवन को सीमाओं में नहीं, बल्कि पूरे उत्साह और पूर्णता के साथ जीना ही सच्ची सफलता है।


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