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बाजार

बाज़ार

बाज़ार में यूँ ही
निकल जाता हूँ मैं,
कुछ खरीदने नहीं —
बाज़ार का हाल लेने।

इन बाज़ारों में मुझे
जीवन और उसके संघर्ष
की कसक दिखती है।

भिखारियों के वेश में
मुझे जीवन का श्राप
दिखाई देता है।

मुँह चिढ़ाते
नए युगल जोड़ों में
दिखती है
जीवन की किलकारी।

शराब के नशे में चूर
व्यक्ति में दिखती है
जीवन से दूरी।

हर दुकान,
हर चेहरा,
हर आवाज़
जैसे कोई कहानी कहती है।

कहीं उम्मीद बिकती है,
कहीं मेहनत,
कहीं सपने,
और कहीं थकान।

ये सब देखता हूँ मैं,
और बाज़ार से
गुज़र जाता हूँ।

पर अपने आप से नहीं।
क्योंकि भीतर का सवाल
अब भी वहीं खड़ा रहता है।

और शायद इसलिए
मैं फिर से
उसी बाज़ार में लौट आता हूँ।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता बाज़ार को केवल वस्तुओं के लेन-देन की जगह नहीं बल्कि जीवन के एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि जब बाज़ार से गुजरते हैं तो उन्हें वहाँ केवल दुकानों और ग्राहकों की भीड़ नहीं दिखाई देती, बल्कि जीवन के अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं।

कहीं गरीबी और संघर्ष है, कहीं प्रेम और नई उम्मीदें हैं, तो कहीं जीवन से थका हुआ मनुष्य है जो नशे में अपने दर्द से दूर भागने की कोशिश करता है। इन सब दृश्यों के माध्यम से बाज़ार मानो समाज का एक जीवंत दर्पण बन जाता है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक को यह महसूस कराती है कि जीवन के वास्तविक रंग अक्सर रोज़मर्रा के दृश्यों में ही छिपे होते हैं। बाज़ार से गुजरते हुए कवि केवल बाहरी दुनिया को नहीं देखते, बल्कि अपने भीतर उठते प्रश्नों से भी सामना करते हैं।


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