
अधूरा मिलन
फिर एक सुबह
जब ऊपर आया मैं,
उसे फिर वहीं पाया —
जैसे हर दिन
वहीं खड़ी हो।
सहमी सी थी वो,
पर उसके चेहरे पर
एक हल्की मुस्कान थी,
जिससे जैसे
चारों ओर उजाला फैल गया।
धीरे-धीरे
वो आकर खड़ी हुई
उस निर्जल कुंड के पास,
शायद उसे
प्यास लगी थी।
वो उसमें झाँक रही थी,
शायद खुद को
परख रही थी,
या अपने ही मन से
कुछ कह रही थी।
उसके मन में
बहुत कुछ था,
और मेरे मन में भी —
पर मैं बेबस था।
हिम्मत उठती नहीं थी मन में,
साहस आता नहीं था तन में।
अंत घड़ी तक
मैं उसे देखता रहा,
जहाँ तक मेरी नज़र गई
मैंने उसे पाया।
शायद उसने भी
मुझे देखा होगा —
पर हम दोनों
मिल न सके।
न वो पास आई,
न मैं ही
एक कदम बढ़ा पाया।
पर अब
मैं तुम्हें कोई दोष नहीं दूँगा,
अपने मन को
मैं साध लूँगा।
अच्छा ही हुआ
जो तुमने अपनी आहों में
मेरे मन का फूल जला दिया,
और उसी राख से
मेरे भीतर
एक नई सुगंध जगा दी।
जिससे मेरा संकल्प बढ़ा,
और जग की माया
धीरे-धीरे घटती गई।
तभी तो अब
वैराग्य सा जीवन
बिता रहा हूँ मैं,
देव की ओट में
दुःख-दर्द भुला रहा हूँ।
सब कुछ
भूल चुका हूँ मैं —
पर तुम्हारा चेहरा नहीं।
वो अब भी
मेरे एकांत में,
मेरी आँखों में
मुस्कुराता रहता है…
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता अधूरे प्रेम की उस गहरी अनुभूति को दर्शाती है जहाँ दो लोग एक-दूसरे के बहुत पास होकर भी मिल नहीं पाते। यह दूरी केवल भौतिक नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी होती है, जो उनके संबंध को अधूरा बना देती है।
कविता में “निर्जल कुंड” और “मौन दूरी” जैसे प्रतीक यह दर्शाते हैं कि कभी-कभी जीवन में अवसर सामने होते हुए भी मनुष्य उन्हें पकड़ नहीं पाता। यह अधूरापन धीरे-धीरे आत्मचिंतन और वैराग्य की ओर ले जाता है।
कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना प्रेम, विरह और आत्मसंयम का सुंदर संगम है। उनकी पंक्तियाँ यह संकेत देती हैं कि हर अधूरा मिलन केवल दुख नहीं देता, बल्कि वह मनुष्य को भीतर से बदलकर एक नए आत्मबोध की ओर भी ले जाता है।




