
जीवन के इस पार प्रिये
जीवन के इस पार प्रिये,
तुम हो, मधु है, जीवन है,
हर श्वास में
तुम्हारा स्पर्श है।
जीवन के उस पार प्रिये,
शून्य, अंधकार,
निर्जन अपार —
जहाँ कुछ भी नहीं,
बस एक खाली विस्तार है।
इस पार
हँसी की हलचल है,
धड़कनों का संगीत है,
तुम्हारी आँखों में
पूरा संसार है।
उस पार
न कोई स्वर है,
न कोई रंग,
बस एक ठहराव है
जो सब कुछ निगल जाता है।
जब तुम पास होती हो,
तो समय भी
ठहर जाता है,
और हर क्षण
अनंत बन जाता है।
जब तुम दूर होती हो,
तो वही समय
रेत सा फिसल जाता है,
और हर पल
अधूरा रह जाता है।
इस पार
प्रेम है,
आशा है,
जीने का कारण है।
उस पार
बस सवाल हैं,
खामोशी है,
और एक अनजाना डर है।
तो मैं यहीं रहना चाहता हूँ —
तुम्हारे पास,
इस पार,
जहाँ तुम हो।
क्योंकि
जिस जीवन में तुम नहीं,
वो जीवन नहीं,
बस एक प्रतीक्षा है
उस पार की।
और यदि कभी
जाना भी पड़े उस पार,
तो साथ चलना —
ताकि
शून्य भी
संसार बन जाए,
और अंधकार में भी
तुम्हारा प्रकाश उतर आए…
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता प्रेम और अस्तित्व के गहरे संबंध को दर्शाती है। कवि बताते हैं कि जब प्रिय साथ होता है, तब जीवन पूर्ण, जीवंत और अर्थपूर्ण प्रतीत होता है, लेकिन उसके बिना सब कुछ शून्य और अधूरा लगता है।
“इस पार” और “उस पार” यहाँ जीवन और शून्यता के प्रतीक हैं। यह दर्शाता है कि प्रेम ही वह शक्ति है जो जीवन को अर्थ और दिशा देती है।
कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना भावनात्मक और दार्शनिक दोनों स्तरों पर प्रभाव डालती है। यह पाठक को यह समझने के लिए प्रेरित करती है कि सच्चा प्रेम केवल साथ नहीं बल्कि जीवन का आधार होता है।



