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जीवन का मोड़

जीवन का मोड़

किधर जाता है
जीवन को छोड़
तेरी इस राह के
हर किनारे पर है मोड़।

संभल जा अभी भी,
रुक कर ज़रा सोच ले,
मुड़ जा इस राह से
वरना खुद को खो देगा।

मुड़ जा,
नहीं तो खो जाएगा,
फिर अपनी करनी पर
जीवन भर पछताएगा।

बड़ा आसान है
राह से भटक जाना,
मस्ती के झूठे सागर में
खुद को बहा जाना।

पर जीवन ये नहीं प्यारे,
सिर्फ़ हँस कर दिन बिताना।
राह अगर कठिन न हो
तो मंज़िल का क्या पाना?

जो रास्ता आसान लगे
वही अक्सर धोखा देता है,
जो राह कठिन होती है
वही इंसान गढ़ता है।

कमाल रहा है इस जीवन का —
ये मौका देता है सबको,
गिर कर उठने का,
भटक कर संभलने का।

मुड़ जा इसी मोड़ से,
अभी भी समय है प्यारे।
वरना पछतावे की रातें
बहुत लंबी होती हैं।

इस क्रूर दुनिया में
सच यही रह जाता है —
जो खुद को संभाल ले
वही आगे बढ़ जाता है।

और जो भटक जाए
झूठी चमक की राहों में,
वो अंत में अक्सर
अकेला ही रह जाता है…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता जीवन के उस मोड़ की बात करती है जहाँ मनुष्य को अपने निर्णयों के प्रति सजग रहना पड़ता है। कई बार आसान रास्ते आकर्षक लगते हैं, पर वे भटकाव की ओर ले जाते हैं।

कवि संकेत देते हैं कि सही दिशा चुनने के लिए आत्मचिंतन और साहस आवश्यक है। जो व्यक्ति समय रहते संभल जाता है, वही अपने जीवन को सही अर्थ और उद्देश्य दे पाता है।


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