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विशेष कलाकार

रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

भूख का मजहब

भूख का मजहब

खाली पेट का मजहब
रोटी से होता है,
भूख का धर्म
बस तृप्ति होता है।

मजहब भूख है —
जीने की,
साँसों की,
और उस एक कौर की
जो जीवन को थामे रखता है।

जिसने भूख देखी है,
वो बहस नहीं करता,
वो पूछता नहीं —
बस ढूँढ़ता है
एक टुकड़ा रोटी।

बेतुके विचारों का मतलब
भरे पेट से होता है,
जहाँ थाली भरी हो
वहीं सिद्धांत जन्म लेते हैं।

खाली पेट
ना दर्शन समझता है,
ना उपदेश —
उसे बस
जीना समझ आता है।

तुम मजहब की बात करते हो,
वो रोटी की,
तुम शब्दों में उलझे हो,
वो ज़िंदगी में उलझा है।

जिसका पेट भरा है,
वो विचारों में बंटा है,
जिसका पेट खाली है,
वो सिर्फ जीने में लगा है।

मजहब का शोर
वहीं होता है,
जहाँ भूख की आवाज़
दबा दी जाती है।

और जहाँ भूख बोलती है,
वहाँ मजहब
चुप हो जाता है।

क्योंकि
रोटी से बड़ा
कोई धर्म नहीं,
और भूख से बड़ी
कोई सच्चाई नहीं।

खाली पेट का मजहब
रोटी से होता है —
बाकी सब
भरे पेट की बातें हैं…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता भूख और मजहब के बीच के गहरे अंतर को उजागर करती है। कवि बताते हैं कि जब पेट खाली होता है, तब इंसान के लिए सबसे बड़ा धर्म केवल रोटी और जीवन को बचाए रखना होता है।

कविता में “भरा पेट” और “खाली पेट” दो अलग-अलग मानसिकताओं का प्रतीक हैं। जहाँ भरे पेट वाले लोग विचारों और सिद्धांतों में उलझे रहते हैं, वहीं भूखा इंसान केवल अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करता है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना सामाजिक सच्चाई को बेबाकी से सामने लाती है। यह पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि असली धर्म वही है जो जीवन को बनाए रखे, न कि केवल विचारों और बहसों में सीमित रह जाए।


फ्रेश चुटकुले



दर्द का इलाज़

यह कविता सिखाती है कि दर्द ही जीवन का सच्चा शिक्षक है। सुख केवल ठहराव देता है, लेकिन दर्द इंसान को बदलता है और उसे अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है।

प्यार की भीख मत माँगो

यह कविता प्रेम में आत्मसम्मान की महत्ता को दर्शाती है। जबरदस्ती या भीख में मिला प्यार सच्चा नहीं होता, इसलिए खुद की इज़्ज़त बनाए रखना ही सच्चे प्रेम की पहली शर्त है।


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