
ज़िंदगी जीना
ज़िंदगी को जीना
आसान नहीं होता,
ज़िंदगी को जीना
आसान बनाना पड़ता है।
कुछ सब्र करके,
कुछ बर्दाश्त करके,
और बहुत कुछ
नज़रअंदाज़ करके।
हर बात पर
रुक जाओगे अगर,
तो चल नहीं पाओगे।
हर दर्द को
दिल में रखोगे अगर,
तो मुस्कुरा नहीं पाओगे।
ज़िंदगी सिखाती है —
छोड़ना भी,
और आगे बढ़ना भी।
कभी हालात से समझौता,
कभी खुद से समझाना,
कभी हार को भी
चुपचाप अपनाना।
क्योंकि
हर लड़ाई जीतना
ज़रूरी नहीं होता,
पर हर बार
टूट जाना भी
ज़रूरी नहीं होता।
कुछ रिश्ते
समझ से चलते हैं,
कुछ समय से,
और कुछ बस
चुप रह जाने से।
ज़िंदगी को जीना
बस इतना ही है —
जहाँ ज़रूरत हो
वहाँ बोल देना,
जहाँ सही लगे
वहाँ रुक जाना,
और जहाँ शांति मिले
वहाँ खुद को
छोड़ देना।
क्योंकि
ज़िंदगी को जीना
आसान नहीं होता,
ज़िंदगी को जीना
आसान बनाना पड़ता है…
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता जीवन को सरल और संतुलित बनाने की कला को दर्शाती है। कवि बताते हैं कि जीवन अपने आप आसान नहीं होता, बल्कि उसे समझ, धैर्य और स्वीकार करने की क्षमता से सरल बनाना पड़ता है।
“सब्र”, “बर्दाश्त” और “नज़रअंदाज़” जैसे शब्द यहाँ जीवन जीने के तीन महत्वपूर्ण सूत्र बन जाते हैं। हर छोटी बात पर प्रतिक्रिया देने के बजाय, सही चीज़ों को महत्व देना ही मानसिक शांति का आधार है।
कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक को यह समझाती है कि जीवन में हर चीज़ को पकड़कर रखना आवश्यक नहीं होता। कई बार छोड़ देना, स्वीकार करना और आगे बढ़ जाना ही सच्ची समझ और परिपक्वता की निशानी होती है।




