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माँ — जो कभी जाती नहीं

माँ — जो कभी जाती नहीं

माँ आएगी — ये आशा
कितनी अच्छी लगती है,
लगता है बस
अब सब ठीक हो जाएगा।

अब आएगी माँ,
और जीवन फिर से
मधुर तान में बहने लगेगा,
उसकी मुस्कान में
हर दर्द घुल जाएगा।

जब भी थक जाता हूँ,
यही सोचकर संभल जाता हूँ —
कि माँ आएगी,
और सब ठीक कर देगी।

पर एक दिन
ये सवाल भी आया —
क्या माँ हर बार आएगी?
क्या सच में
हर बार जीवन निखर जाएगा?

क्या हर बार
उसके आशीर्वाद से
सब बदल जाएगा?

फिर धीरे-धीरे
समझ आया…

माँ तो
कभी छोड़कर गई ही नहीं।

वो हर बार
आती नहीं,
क्योंकि
वो हमेशा यहीं होती है —

मेरे विश्वास में,
मेरी हिम्मत में,
मेरी हर कोशिश में।

अब इंतज़ार नहीं करता,
बस महसूस करता हूँ —

माँ
कभी जाती नहीं…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता माँ के प्रेम और उसकी शाश्वत उपस्थिति को बेहद भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करती है। कवि बताते हैं कि माँ केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक एहसास है, जो हमेशा हमारे साथ रहता है।

कविता में “माँ आएगी” एक आशा का प्रतीक है, जो हमें कठिन समय में संभालती है। लेकिन अंत में यह समझ आता है कि माँ कभी जाती ही नहीं, वह हमारे विश्वास, साहस और हर प्रयास में जीवित रहती है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक के दिल को छू जाती है और यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, बल्कि वह हमेशा हमारे भीतर एक शक्ति बनकर रहता है।


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