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विशेष कलाकार

रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

करोड़ों खामियाँ

करोड़ों खामियाँ

तुम्हें बस
लाख तक गिनती आती है,
और मुझमें
करोड़ों खामियाँ हैं।

तुम्हारी नज़र
साफ़-सुथरी चीज़ें ढूँढती है,
मैं तो धूल में भी
अपना सच छिपाए बैठा हूँ।

तुम हिसाब करते हो —
मैं महसूस करता हूँ।

तुम कहते हो —
“इतनी गलतियाँ?”
मैं कहता हूँ —
“इतनी कोशिशें।”

हर खामी के पीछे
एक गिरना है,
हर गिरने के पीछे
एक उठना है।

तुम्हें संख्या दिखती है,
मुझे सफर दिखता है।

तुम्हें दाग दिखते हैं,
मुझे ज़ख्मों की कहानी।

तुमने मुझे
तराज़ू पर रखा,
मैंने खुद को
आईने में देखा।

तुम्हारे पास
आँकड़े हैं,
मेरे पास
अनुभव।

हाँ,
करोड़ों खामियाँ हैं मुझमें,
क्योंकि
मैंने लाखों बार
कोशिश की है।

और जो कोशिश करता है,
वो बेदाग नहीं होता।

तुम लाख तक गिनो,
मैं सफर तक जीऊँगा।

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता खामियों को कमजोरी नहीं, बल्कि प्रयासों की पहचान के रूप में प्रस्तुत करती है। कवि बताते हैं कि जो व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश करता है, उससे गलतियाँ भी होती हैं, और वही अनुभव उसे परिपक्व बनाते हैं।

यह रचना हमें सिखाती है कि दूसरों की आलोचना से अधिक महत्वपूर्ण अपनी यात्रा को समझना है। जो प्रयास करता है, वही गिरता है, और जो गिरता है, वही उठकर मजबूत बनता है।


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बाजार

बाजार में यूँ ही निकल जाता हूँ मैं, कुछ खरीदने नहीं बाजार का हाल लेने, इन बाजारो में मुझे जीवन और उसके संघर्ष की कसिस दिखती है, भिखारियों के वेश में मुझे जीवन का श्राप दीखता है, मुँह चिड़ाये नए युगल जोड़ो में दिखती जीवन की किलकारी, शराब के नशे में चूर व्यक्ति में,...

वही प्रेम है

यह कविता सच्चे प्रेम की परिभाषा को कोमल और गहराई से व्यक्त करती है। यह बताती है कि प्रेम वह है जो तोड़ता नहीं, बल्कि सींचता है; जो बदलता नहीं, बल्कि खिलने की जगह देता है।


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