
गरूर की चादर
बहुत बेशर्म होकर
मैंने जिया ये जीवन।
पूरा जीवन निकल गया
भीख में ही —
भीख में जिया जीवन,
भीख में खाया भोजन,
भीख में मनाया उत्सव,
भीख में पी दारू।
भीख में ही गुज़र गया
ये अभागा जीवन।
पर एक सवाल
हर रोज़ सामने खड़ा था —
ये गरूर किसके लिए?
जब हाथ खाली थे,
जेब खाली थी,
और दिल भी
धीरे-धीरे खाली होता गया।
तू गुजरता रहा
हर दिन
दीन-दुखी बनकर,
जीवन की असली मस्ती से दूर,
अपने ही बनाए
गरूर के एकांत में।
ओढ़े रहा
गरूर की चादर,
जैसे वही
तेरी पहचान हो।
पर सच यह था —
इसी गरूर ने
तुझसे छीन लिया
तेरा खुशहाल जीवन।
क्योंकि उस दिन
तू झुका नहीं।
और आज
सड़क पर लेटा हुआ
भीख मांग रहा है
खुशी का जीवन।
अजीब खेल है यह —
जब झुक सकता था
तब झुका नहीं,
और जब झुकना पड़ा
तब देर हो चुकी थी।
क्योंकि जीवन
गरूर से नहीं चलता,
वो तो
झुकने की समझ से चलता है।
और जो समय रहते
झुकना सीख जाता है,
वही
टूटने से बच जाता है।
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता मनुष्य के झूठे अहंकार और गरूर की त्रासदी को दर्शाती है। कई बार व्यक्ति अपने अभिमान के कारण जीवन की सरल खुशियों, रिश्तों और अवसरों को ठुकरा देता है। समय बीतने के बाद वही अहंकार उसे अकेलेपन और पछतावे की ओर धकेल देता है।
कवि ने “गरूर की चादर” का प्रतीक प्रयोग करके यह बताया है कि अहंकार मनुष्य को एक ऐसे आवरण में ढक देता है जहाँ वह अपनी वास्तविक स्थिति को देख ही नहीं पाता। जब तक उसे अपनी भूल का एहसास होता है, तब तक जीवन के कई अवसर हाथ से निकल चुके होते हैं।
कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना पाठक को विनम्रता का महत्व समझाती है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन में समय रहते झुकना कमजोरी नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता है, क्योंकि यही झुकना मनुष्य को टूटने से बचाता है।




