
बार-बार
कितनी दूरियों से
कितनी बार
आया मैं हर बार —
बार-बार।
एक समय सा बन गया था
आने का,
एक कसम सा बन गया था
निभाने का।
रोज-रोज करते-करते
ये सब बार-बार,
थक गया था मैं,
पर भाग न पाया था मैं।
हर रास्ता
तुम तक जाता था,
हर मोड़
तुम पर आकर रुक जाता था।
ये चाहत थी
या आदत थी,
समझ न पाया —
बस चलता गया
बार-बार।
कभी खुद को समझाया,
कभी दिल को बहलाया,
पर हर बार
वहीं लौट आया —
बार-बार।
फिर एक दिन
कुछ टूट सा गया,
या शायद
कुछ छूट सा गया।
अब कितनी नज़दीकियों से
कितनी बार,
मैं तुम्हें
सोचता ही नहीं।
ना आने का मन करता है,
ना रुकने का,
अब कोई वादा
खुद से भी नहीं करता।
अब लगता है
कुछ उधर रह गया है,
और जो बचा है —
वो सच में मेरा है।
अब रास्ते
खुद के हो गए हैं,
और कदम
हल्के हो गए हैं।
जो कभी
बंधन लगता था,
वो अब
सिर्फ एक याद है।
बार-बार की वो चाहत
अब
ठहर गई है —
और शायद
यही ठहराव
मुक्ति है…
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता बार-बार लौटने वाली भावनाओं और उनसे जुड़े मानसिक बंधनों की गहराई को दर्शाती है। कवि बताते हैं कि कई बार इंसान चाहकर भी उन आदतों और रिश्तों से दूर नहीं जा पाता, जो उसे थका देते हैं।
“बार-बार” शब्द यहाँ एक प्रतीक बनकर सामने आता है, जो उस चक्र को दर्शाता है जिसमें इंसान बार-बार वही गलतियाँ दोहराता है और उन्हीं भावनाओं में उलझा रहता है।
कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना अंततः मुक्ति और आत्मबोध की ओर ले जाती है। यह सिखाती है कि जब इंसान खुद को समझ लेता है, तब वह धीरे-धीरे उन बंधनों से बाहर निकलकर अपनी सच्ची राह पर चलना शुरू कर देता है।




