
पहला मिलन
आज प्रिये,
बादलों की ये घनेरी छाया
फिर तुम्हारी याद दिला रही है,
सोए हुए उस तूफ़ान को
धीरे-धीरे जगा रही है।
क्योंकि इन्हीं बादलों के बीच
तुम मिले थे,
पहली बार —
सहमे से, ठहरे से,
पर आँखों में
अनकही सी चमक लिए।
तुम्हारे आकर्षण को देखकर
मैं जैसे ठहर गया था,
और आज फिर
वही दृश्य सामने है —
हम दोनों
फिर से दीवाने से खड़े हैं।
एक ही जगह,
जहाँ से तुम्हें देखता था मैं —
ऊपर…
तुम्हें रिमझिम बूँदों से खेलते देखा,
हथेलियों पर
बूँदों को सँजोते देखा।
चारों ओर एकांत था,
केवल बारिश की
मधुर रागिनी थी,
और तुम…
एक हाथ में आँचल पकड़े,
सर्द हवा से
खुद को समेटे हुए,
थरथराते ओठ भी देखे,
और उन्हीं ओठों पर
मुस्कान भी देखी।
पीताम्बर वस्त्र में तुम —
जैसे बादलों के बीच
उगता हुआ सूर्य,
और उस पल
जैसे पूरा आकाश
तुम पर ही ठहर गया था।
आज बादल भी खुश हैं,
हवा भी,
और शायद
हम दोनों भी।
दूर खड़े होकर भी
तुम्हें निहारते रहे,
आँखें तड़पती रहीं,
पर कदम
आगे बढ़ न सके।
मस्त हवाएँ चल रही थीं,
तुम्हारे बालों को
धीरे-धीरे छूती हुई,
और मैं…
तुम्हें खुद से
शर्माते हुए देखता रहा।
आज पहली बार प्रिये,
तुम्हें इतना निर्मल,
इतना शीतल देखा —
जैसे कोई प्रार्थना
रूप लेकर सामने आ गई हो।
आज दिल में
सारे द्वेष मिट गए,
जो कभी अधूरे थे हम,
आज जैसे
पूरे हो गए।
आज पहली बार
खुद को इतना खुश पाया,
तभी तो प्रातः मंदिर में
जल चढ़ाया।
अब इतना निर्भय हो गया हूँ
कि मृत्यु का भय नहीं,
जिसकी चाह थी
वो मिल गया —
अब कोई ग़म नहीं।
और अगर बिछड़ भी गए
तो अब नहीं तड़पूँगा,
क्योंकि तुम
अब दिल में बस गए हो।
कैसे बिछड़ेगा कोई
जो भीतर बसता है?
देखना प्रिये,
तुम्हें भी ऐसा हुआ होगा —
कभी दर्द में
आँखों से आँसू बहा होगा।
हे देव, मुझे बल दे
कि इस हर्ष को सह सकूँ,
प्रिय का दर्द
अपने भीतर ले सकूँ।
क्योंकि मैं
उसका दुःख देख नहीं सकता,
मुस्कुराते ओठों को
रोते नहीं देख सकता।
उसके दुःख को
मैं जी लूँ,
उसकी पीड़ा में
अपना दुःख मिला लूँ।
हे देव, मुझे ऐसी शक्ति दे,
हे देव, मुझे साहस दे…
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता प्रेम के उस प्रथम अनुभव को दर्शाती है जहाँ आकर्षण, संकोच और भावनाओं की गहराई एक साथ उपस्थित होती है। बारिश और एकांत का वातावरण इस मिलन को और अधिक भावनात्मक और स्मरणीय बना देता है।
कवि ने प्रकृति के माध्यम से प्रेम को एक पवित्र अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया है। “रिमझिम बारिश”, “हवा”, और “एकांत” जैसे तत्व इस बात को दर्शाते हैं कि यह मिलन केवल बाहरी नहीं बल्कि आत्मिक स्तर पर भी घटित हो रहा है।
कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना प्रेम को केवल एक भावना नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ मिलन अंततः आत्मसमर्पण और भक्ति में परिवर्तित हो जाता है।




