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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

जल चक्र

जल चक्र

जल का ये चक्र
चलता ही रहेगा,
बारिश की बूँदों से होकर
धूप में जलकर
वाष्प में बदलता रहेगा।

यूँ ही ये चक्र
जीवन की भाँति
अविरल, अंतहीन
बहता ही रहेगा।

तुम रहो या न रहो
इस जीवन में,
ये जल चक्र
रुकता नहीं,
कभी थमता नहीं।

जिस बारिश की बूँदों में
तुम भीगते हो,
क्या कभी जान पाए हो —
कि वह जल
किस बादल से आया है?

किन नदियों से निकलकर
वह आकाश तक पहुँचा था,
कितनी धरती को छूकर
फिर बादल बना था।

यह जानना आसान नहीं,
यह जल चक्र
केवल दिखता नहीं,
समझ में भी
आसान से आता नहीं।

बारिश का हो,
या नदी का हो,
या समंदर की गहराई का —
हर रूप में
वही जल है।

जल-जलकर बना है ये जल,
सूरज की तपिश पाई है इसने,
अनगिनत यात्राएँ की हैं,
हर रूप में
स्वयं को ढाला है इसने।

कभी बूँद बना,
कभी धारा बना,
कभी लहर बनकर
किनारों से टकराया।

तभी तो
अमर होने का मान मिला है,
यूँ ही नहीं
देव कहलाता है जल।

यह जीवन को
मुस्कुराता है,
सूखी धरती को
हरियाली बनाता है।

और कभी-कभी
मृत्यु को भी
भरमा जाता है —
क्योंकि जहाँ जल है,
वहीं जीवन है।

यह चक्र
सिर्फ प्रकृति का नहीं,
हमारे अस्तित्व का भी है।

हम भी
उसी जल की तरह हैं —
रूप बदलते हुए,
यात्रा करते हुए,
पर अंत में
उसी सत्य में मिलते हुए।

जल अमर है,
उसकी यात्रा अमर है,
और यही
जीवन का भी सार है।

अमर है यह जल चक्र…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता जल चक्र के माध्यम से जीवन के गहरे दर्शन को प्रस्तुत करती है। जल अपने विभिन्न रूपों में निरंतर परिवर्तित होता रहता है, फिर भी उसका अस्तित्व बना रहता है। इसी प्रकार जीवन भी परिवर्तनशील है, लेकिन उसका मूल सत्य स्थायी रहता है।

कवि ने जल को केवल एक प्राकृतिक तत्व के रूप में नहीं बल्कि एक जीवंत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। “जल-जलकर बना है ये जल” पंक्ति यह दर्शाती है कि जीवन भी संघर्ष, तप और अनुभवों से होकर ही परिपक्व होता है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना विज्ञान और दर्शन का सुंदर संगम है। यह पाठक को यह सोचने पर प्रेरित करती है कि जैसे जल निरंतर यात्रा करता है और रूप बदलता है, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी एक अनंत यात्रा है जिसमें परिवर्तन ही उसका स्थायी सत्य है।


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