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तेरे दुःख, तेरी राह

तेरे दुःख, तेरी राह

तेरे दुःख,
तेरे ही रहेंगे,
तू चाहे इसको
सुना, या उसको।

रो के जी,
या हँस के जी,
तेरा जीवन
तेरा ही रहेगा।

तू इसको
जैसे भी सींच,
दर्द के पानी से
या उम्मीद की धूप से।

लोग सुनेंगे,
सर हिलाएँगे,
कुछ पल ठहरेंगे —
फिर चले जाएँगे।

तेरी कहानी
तेरी ही रहेगी,
कोई और
इसे जी नहीं पाएगा।

कुछ साथ देंगे,
कुछ समझेंगे भी,
पर अंत में
चलना तुझे ही होगा।

तेरे दुःख,
तेरे ही रहेंगे…

तू चाहे
उन्हें छुपा ले,
या खुलकर
दुनिया के सामने रख दे।

दर्द कम नहीं होता
सिर्फ बाँट देने से,
बस हल्का होता है
थोड़ा सा…

और फिर
वापस आ जाता है,
तुझे याद दिलाने —
कि ये तेरा है।

पर सुन…

इन्हीं दुःखों में
तेरी ताकत छुपी है,
इन्हीं आँसुओं में
तेरी पहचान।

जो इन्हें समझ गया,
वो खुद को समझ गया,
और जो खुद को समझ गया —
वो जीवन को
जीना सीख गया।

तो भाग मत
इनसे,
ना ही इन्हें कोस…

तेरे दुःख,
तेरे ही रहेंगे —
पर तू चाहे
तो इन्हें
अपनी ताकत बना सकता है…

✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा

कविता का भावार्थ

यह कविता जीवन के दुःखों को स्वीकार करने की गहरी समझ प्रस्तुत करती है। कवि बताते हैं कि हर व्यक्ति को अपने संघर्ष स्वयं ही जीने होते हैं, क्योंकि कोई और उन्हें पूरी तरह समझ या अनुभव नहीं कर सकता।

कविता में यह स्पष्ट किया गया है कि दुःख केवल पीड़ा नहीं बल्कि एक सीख भी है। जब इंसान अपने दर्द से भागने के बजाय उसे समझना शुरू करता है, तब वही दुःख उसकी ताकत बन जाता है।

कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना आत्मबोध और आंतरिक विकास की ओर संकेत करती है। यह पाठक को यह समझाती है कि जीवन के कठिन अनुभव ही हमें मजबूत बनाते हैं और हमें स्वयं से मिलाते हैं।


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