
देशभक्ति बनाम ट्रेंड
अब देशभक्ति
स्टेटस में लगती है,
ज़मीन पर नहीं।
तिरंगा
प्रोफ़ाइल फोटो में चमकता है,
पर सड़क पर
कचरे में पड़ा मिलता है।
शब्द बड़े हैं,
त्याग छोटा।
हैशटैग तेज़ हैं,
जिम्मेदारी धीमी।
भीड़
नारे लगाती है,
पर सच पूछो तो
किसी ने पड़ोसी का हाल
पूछा भी नहीं।
देश अब
डीपी में बसता है,
दिल में नहीं।
देशभक्ति
अब ट्रेंड करती है,
ट्रेंड खत्म —
जज़्बा खत्म।
जो सैनिक सीमा पर है,
उसकी याद
बस दो पोस्ट तक रहती है।
जो किसान खेत में है,
उसका नाम
कमेंट सेक्शन में खो जाता है।
हम राष्ट्र से प्यार करते हैं,
पर नियम से नहीं।
हम संविधान की बात करते हैं,
पर पालन की नहीं।
हम कहते हैं —
“देश पहले।”
पर सुविधा
हमेशा पहले रख देते हैं।
देशभक्ति
शोर नहीं होती।
वो टैग नहीं होती।
वो पोस्ट नहीं होती।
वो आदत होती है।
वो ईमान होती है।
वो जिम्मेदारी होती है।
जो ज़मीन पर दिखे,
तभी सच्ची होती है।
वरना
स्टेटस बदलने से
राष्ट्र नहीं बदलता।
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता डिजिटल युग में बदलती देशभक्ति की धारणा पर प्रश्न उठाती है। कवि संकेत देते हैं कि सच्चा राष्ट्रप्रेम केवल ऑनलाइन पोस्ट और स्टेटस तक सीमित नहीं होना चाहिए।
देशभक्ति तब सार्थक होती है जब वह व्यवहार, जिम्मेदारी और नियमों के पालन में दिखाई दे। राष्ट्रप्रेम शोर नहीं, बल्कि निरंतर आचरण का नाम है।


