
मृत्यु से पहले
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता।
आदमी
मरने के बाद
कभी नहीं बोलता।
यह सब जानते हैं।
पर सच यह है —
कुछ लोग
जीते-जी
सोचना बंद कर देते हैं।
कुछ लोग
सच बोलना छोड़ देते हैं।
और फिर
धीरे-धीरे
अंदर से
मर जाते हैं।
जिस दिन
प्रश्न करना रुक जाए,
जिस दिन
अन्याय पर चुप्पी हो जाए,
जिस दिन
सपनों पर ताला लग जाए —
वही दिन
पहली मृत्यु का दिन है।
शरीर बाद में रुकता है।
आत्मा पहले।
मरना
साँस रुकने से नहीं,
सोच रुकने से शुरू होता है।
और जो
कुछ नहीं सोचता,
कुछ नहीं बोलता —
वह ज़िंदा होकर भी
जीवित नहीं होता।
इसलिए
मरने से पहले
सोचना मत छोड़ो।
चुप्पी से पहले
सच मत छोड़ो।
क्योंकि
अंदर की मृत्यु
सबसे खतरनाक होती है।
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता शारीरिक मृत्यु और मानसिक जड़ता के बीच का अंतर स्पष्ट करती है। कवि बताते हैं कि जब मनुष्य प्रश्न करना, सोचने और सच बोलने की क्षमता खो देता है, तब उसकी आंतरिक मृत्यु प्रारंभ हो जाती है।
यह रचना हमें जागरूक रहने, विचारशील बने रहने और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का संदेश देती है। जीवित रहना केवल सांस लेने का नाम नहीं, बल्कि सजग होकर जीने का नाम है।


