
तेरी कमी, मेरा मोह
सब में कुछ न कुछ
कमी होती है,
मुझमें भी है —
तेरी कमी।
तुमसे दूरी ही जैसे
धीरे-धीरे
बन जाती है
मेरा मोह।
जितना दूर जाता हूँ
उतना ही
तुम पास आती हो,
हर खामोशी में
तुम्हारी आहट सुनाई देती है।
अजीब है ये रिश्ता —
जहाँ मिलन नहीं,
पर बंधन गहरा है।
तुम्हें पा न सका,
पर खो भी न सका,
तुम मेरे भीतर
कहीं ठहर गई हो।
तेरी कमी
अब कमी नहीं रही,
वो आदत बन गई है,
और वही आदत
अब मेरा सहारा है।
कभी सोचता हूँ —
अगर तुम होती पास,
तो शायद
ये मोह न होता।
क्योंकि जो मिल जाता है
वो ठहर जाता है,
और जो नहीं मिलता
वो भीतर
बस जाता है।
तुम्हारी याद
अब दर्द नहीं,
एक सुकून है,
जो हर खाली पल को
भर देता है।
मैंने अब
तुम्हें पाना छोड़ दिया है,
पर तुम्हें महसूस करना
नहीं छोड़ा।
क्योंकि
मोह वही नहीं
जो पास रखे,
मोह तो वो है
जो दूर होकर भी
दिल में बस जाए।
और शायद
यही मेरा सच है —
कि तेरी कमी ही
मेरा मोह है…
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता अधूरे प्रेम और दूरी से उत्पन्न मोह की गहरी भावना को दर्शाती है। कवि बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति जीवन में उपस्थित नहीं होता, तब उसकी कमी ही धीरे-धीरे एक स्थायी भावनात्मक जुड़ाव बन जाती है।
कविता में “कमी” को केवल अभाव के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो मनुष्य के भीतर गहराई से बस जाता है। यह कमी ही स्मृति, आदत और अंततः मोह का रूप ले लेती है।
कवि श्रीकांत शर्मा की यह रचना प्रेम के उस सूक्ष्म रूप को सामने लाती है जहाँ मिलन से अधिक प्रभाव दूरी का होता है। यह कविता पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि कई बार जो हमें नहीं मिलता, वही हमारे भीतर सबसे गहराई से बस जाता है।




