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बातो का

मैं उन्ही बातो का
जिम्मेदार हूँ
जो मैंने कही है,
उनका नहीं जो आपने समझी है…

आदत छूटे नहीं छूटती

किसी समय चंद्रमा बहुत सुंदर था। हर दिन उसका चेहरा खिला ही रहता था और चाँदनी पूरी रात छिटकी रहती थी। कुछ दिन बाद चाँद पर मनहूसी सवार हुई। वह चुप रहने लगा, हँसने और मुस्कुराने की आदत छोड़कर वह मुँह लटकाए बैठा रहता।

जैसे-जैसे चुप्पी बढ़ी वैसे-वैसे चाँद की रोशनी भी घटने लगी। यहाँ तक कि पंद्रह दिन में वह बिलकुल कुरूप हो गया। न उसके चेहरे पर रोशनी रही न चाँदनी निकली। लोगों को भी अखरा।

चाँद अपना दुखड़ा रोने विधाता के पास पहुँचा और कहा -”मेरी खूबसूरती कहाँ चली गई ? मैं काला कुरूप क्‍यों हो गया ? ”विधाता ने कहा -”मूर्ख तू इतना भी नहीं जानती। हँसना ही खूबसूरती है, मुसकराहट का नाम ही चाँदनी है। जा, मनहूसी छोड़ और हर दिन हर घड़ी खिलखिलाता रह, तेरी खूबसूरती फिर वापस आ जाएगी।”

चंद्रमा ने विधाता कौ बात मानी, वह फिर हँसने की कोशिश करने लगा। जितनी सफलता मिलती गई उतनी ही उसकी खूबसूरती चमकती गई पंद्रह दिन में फिर पुरानी हालत पर पहुँच गया। पूर्णमासी के दिन पूरे प्रकाश के साथ चमका।

पर हाय री पुरानी आदत ! वह छुड़ाए न छूटी। मनहूसी फिर उस पर सवार हुई, चेहरा लटकाने और चुप रहने का ढर्रा उसने फिर अपनाया तो वही हालत फिर हुई। अमावस्या आते-आते वह फिर काला कुरूप हो गया।

यह देखकर वह घबराया और विधाता की नसीहत को ध्यान में रख फिर मुसकराने लगा और धीरे-धीरे अपनी खोई खूबसूरती उसने फिर बढ़ा ली।

दूसरों की तरह चंद्रमा भी आखिर आदत का गुलाम बन गया। पंद्रह दिन इस पर मनहूसी सवार होती है तो मुँह लटकाए रहता है, परंतु उसकी रोशनी घटती जाती है। जब फिर होश सँभालता है तो हँसते मुसकराते अपनी खोई सुंदरता फिर प्राप्त कर लेता है। मुद्दतों से यह क्रम चलता आ रहा है।

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