back to top
होमकविता

कविता

जब मैं चलूँ

जब मैं चलूँ, तो साया भी अपना साथ ना दे, जब तुम चलो ज़मीन चले, आसमा चले, जब मैं रुकू, अकेला रुकू जब तुम...

बार – बार

कितनी दूरियों से कितनी बार आया मैं हर बार, बार - बार, एक समय सा बन गया था, आने का, एक कसम सा बन...

ईश्वर की भाषा

मौन ईश्वर की भाषा है, इसको सुनने के लिए मौन होना होता है, शोर में दब जाती है, ईश्वर की आवाज़, तुम्हारा बदलाव, शोर...

दर्द का इलाज़

दर्द का इलाज़ दर्द में है सुख में कहाँ है इसका इलाज, जिस अमृत को तुम ढूढ रहे हो वो दर्द में है, सुख...

मुफ्त की रेवड़ी और दूसरी लत

यह व्यंग्यात्मक कविता मुफ्त की लालच और शराब जैसी बुरी लत पर तीखा प्रहार करती है। यह दिखाती है कि मुफ्त की आदत अंततः इंसान से नौकरी, घर, सेहत और सम्मान सब छीन लेती है।

जीवन के इस पार प्रिये

जीवन के इस पार प्रिये तुम हो, मधु है, जीवन है, जीवन के उस पार प्रिये शून्य, अंधकार, निर्जन अपार…- श्रीकांत शर्मादावत - हिंदी...

लोकप्रिय लेख

error: Content is protected !!