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कविता

जीवन की परिभाषा

जीवन की परिभाषा मैं क्या जानु, रहा जो साथ में मेरे अँधेरे में उसकी परछाई मैं क्या जानु,जो खेल रहा था जीवन...

अभागा जीवन

बहुत बेशर्म होकर मैंने जिया ये जीवन, पूरा जीवन निकल गया भीख में बस, भीख में जिया जीवन भीख में खाया भोजन, भीख में...

बाजार

बाजार में यूँ ही निकल जाता हूँ मैं, कुछ खरीदने नहीं बाजार का हाल लेने, इन बाजारो में मुझे जीवन और उसके संघर्ष की...

ओ प्रिया

ओ प्रिया मुझे तू फुंक दे आज जला कर राख कर अरमानो का भस्म करो मेरे झूठे अभिमानो का, दिला दे मुक्ति हर जाल...

ईश्वर

क्या तुमने देखा है बादलों को बूंदो में बदलते, क्या तुमने देखा है उन विशाल हाथो को जो बादलो को घुमाता है छितिज़ के...

जल चक्र

जल का ये चक्र चलता ही रहेगा बारिस की बूंदो से होकर धुप में जल के वास्प में बदल कर, यूँ ही ये चक्र...

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