
औरत का संघर्ष
औरत का संघर्ष
किसी अखाड़े या युद्ध सा नहीं है।
उसका संघर्ष
किसी नवजात बच्चे जैसा है,
जो बोलना चाहता है
पर बोल नहीं पाता।
वो चीखती नहीं,
वो भीतर सिसकती है,
जैसे दीवारों में दरार हो
पर आवाज़ बाहर न आती हो।
उसका दर्द
घाव की तरह दिखता नहीं,
वो चुप्पी की तहों में
धीरे-धीरे पलता है।
वो हर दिन
थोड़ा सा खुद को छोड़ती है,
थोड़ा सा घर बनाती है,
थोड़ा सा सपना दबाती है।
उसकी थकान
सिर्फ़ शरीर की नहीं होती,
वो उम्मीदों का भार भी ढोती है,
जो उसने माँगा भी नहीं।
वो रोती कम है,
संभालती ज़्यादा है,
टूटती कम है,
झुकती ज़्यादा है।
और फिर भी,
हर सुबह सबसे पहले उठकर
दुनिया को जगाती है,
जैसे उसका दर्द
उसकी जिम्मेदारी हो।
औरत का संघर्ष
लड़ाई नहीं —
सहनशीलता की पराकाष्ठा है,
जहाँ वो हर बार हारकर भी
घर को जीत दिलाती है।
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता औरत के मौन और अदृश्य संघर्ष को सामने लाती है। उसका संघर्ष शोरगुल या बाहरी लड़ाई जैसा नहीं होता, बल्कि भीतर सहन करने, चुप रहकर जिम्मेदारियाँ निभाने और अपने सपनों को पीछे रखने की प्रक्रिया है।
कवि यह संदेश देते हैं कि औरत की शक्ति उसकी आवाज़ में नहीं, बल्कि उसकी सहनशीलता में है। वह टूटकर भी परिवार को संभालती है और अपने दर्द को कर्तव्य में बदल देती है। यह कविता उसके मौन साहस को सम्मान देती है।


