
लाइक के भूखे लोग
लोग अब
रोटी से नहीं,
लाइक से
तृप्त होते हैं।
चेहरे पर मुस्कान
कैमरे के लिए होती है,
दिल में क्या है
कोई नहीं पूछता।
एक तस्वीर
दस बार ली जाती है,
एक जीवन
धीरे-धीरे
छूट जाता है।
खाना ठंडा हो जाए
कोई बात नहीं,
बस फोटो
गरम दिखनी चाहिए।
खुशी अब
महसूस नहीं होती,
अपलोड होती है।
दर्द भी
स्टोरी बन जाता है,
और तन्हाई
फ़िल्टर में छुप जाती है।
लोग पूछते हैं —
“कितने लाइक आए?”
कोई नहीं पूछता —
“कैसे हो?”
दुनिया
स्क्रीन पर ताली बजाती है,
पर कमरे की खामोशी
सब जानती है।
हमने
तालियों की जगह
नोटिफिकेशन रख दिए हैं।
और अब
सच्चाई से ज्यादा
एल्गोरिथ्म महत्वपूर्ण है।
लोग अब
जीने के लिए नहीं,
दिखने के लिए
जी रहे हैं।
लाइक के भूखे लोग
पेट नहीं भरते,
बस
अहंकार भरते हैं।
✍️ कवि — श्रीकांत शर्मा
कविता का भावार्थ
यह कविता सोशल मीडिया के उस दौर को दर्शाती है जहाँ लोग वास्तविक अनुभवों की जगह डिजिटल स्वीकृति के पीछे भागते हैं। लाइक और नोटिफिकेशन अब आत्मसंतोष का साधन बनते जा रहे हैं।
कवि यह संकेत देते हैं कि दिखावे की इस संस्कृति में सच्चे रिश्ते और भावनाएँ पीछे छूटती जा रही हैं। असली जीवन स्क्रीन से बाहर है, जहाँ संवाद और संवेदनाएँ अभी भी जीवित हैं।


