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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

मेडिटेशन से बुरी आदतें छोड़ना क्यों आसान हो जाता है?

बुरी आदतें अक्सर कमजोरी या इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम नहीं होतीं। वास्तव में, वे मस्तिष्क द्वारा बनाए गए अत्यंत कुशल स्वचालित पैटर्न होती हैं।

मानव मस्तिष्क ऊर्जा बचाने के लिए दोहराव को पसंद करता है। जब कोई कार्य बार-बार किया जाता है—चाहे वह धूम्रपान हो, मोबाइल स्क्रॉलिंग हो या टालमटोल—मस्तिष्क उसे “ऑटो-मोड” में डाल देता है।

यहीं से आदत जन्म लेती है।

इस अवस्था में व्यक्ति निर्णय नहीं ले रहा होता, बल्कि प्रतिक्रिया कर रहा होता है। तनाव, अकेलापन, ऊब या भावनात्मक असहजता आते ही वही पुरानी आदत सक्रिय हो जाती है।

इसीलिए केवल संकल्प लेना अक्सर असफल होता है। क्योंकि समस्या व्यवहार में नहीं, बल्कि उस अवचेतन प्रक्रिया में होती है जो व्यवहार को जन्म देती है।

बुरी आदतें दरअसल दर्द से बचने का तरीका होती हैं—भावनात्मक या मानसिक दर्द से।

जब तक व्यक्ति यह नहीं देख पाता कि वह आदत क्यों पैदा हुई, तब तक उसे छोड़ना संघर्ष बना रहता है।


मेडिटेशन का सबसे बड़ा प्रभाव व्यवहार पर नहीं, बल्कि जागरूकता पर होता है।

जब व्यक्ति ध्यान करता है, वह अपने विचारों, भावनाओं और इच्छाओं को बिना प्रतिक्रिया के देखना सीखता है। यही कौशल आदतों के संदर्भ में निर्णायक बन जाता है।

आदतें तब शक्तिशाली होती हैं, जब वे अदृश्य होती हैं। मेडिटेशन उन्हें दृश्य बना देता है।

अब व्यक्ति यह देख पाता है—“यह इच्छा अभी उठी है”, “यह बेचैनी अस्थायी है”, “मुझे तुरंत प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता नहीं है।”

न्यूरोसाइंस के अनुसार, मेडिटेशन प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को मजबूत करता है—जो निर्णय और आत्म-नियंत्रण से जुड़ा है—और एमिगडाला की प्रतिक्रियात्मक शक्ति को कम करता है।

यानी मस्तिष्क की संरचना ही बदलने लगती है।

इस स्थिति में आदत को दबाना नहीं पड़ता। वह स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाती है, क्योंकि उसका ईंधन—अचेतन प्रतिक्रिया—खत्म होने लगता है।

यही कारण है कि मेडिटेशन से छोड़ी गई आदतें अक्सर स्थायी होती हैं, जबकि जबरन छोड़ी गई आदतें लौट आती हैं।


मेडिटेशन से बुरी आदतें इसलिए आसानी से छूटती हैं, क्योंकि व्यक्ति खुद से लड़ना बंद कर देता है।

अब आदत को दुश्मन नहीं माना जाता, बल्कि एक संकेत के रूप में देखा जाता है—कि भीतर कुछ असंतुलित है।

यह दृष्टिकोण अपराधबोध को समाप्त करता है, और वहीं से वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है।

मेडिटेशन व्यक्ति को वर्तमान में लाता है—और आदतें हमेशा अतीत की स्मृति या भविष्य की चिंता से जुड़ी होती हैं।

जब मन वर्तमान में टिकता है, तो आदतों के लिए जगह कम हो जाती है।

यही कारण है कि मेडिटेशन से छोड़ी गई आदतें “त्याग” नहीं लगतीं—वे अप्रासंगिक लगने लगती हैं।

अंततः मेडिटेशन हमें बेहतर इंसान नहीं बनाता—वह हमें अधिक जागरूक इंसान बनाता है।

और जागरूकता के सामने कोई भी बुरी आदत लंबे समय तक टिक नहीं पाती।


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