
आज की दुनिया में यह बात कड़वी सच्चाई बन चुकी है कि हुनर से ज़्यादा दिखावे को महत्व दिया जाता है। जो व्यक्ति अपनी बातों, पहनावे और प्रस्तुति से लोगों को प्रभावित कर लेता है, वही अक्सर आगे बढ़ जाता है।
वहीं दूसरी ओर, वास्तविक प्रतिभा रखने वाले लोग कई बार पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे खुद को प्रचारित नहीं कर पाते। उनका ध्यान काम की गुणवत्ता पर होता है, न कि उसके प्रदर्शन पर।
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस प्रवृत्ति को और तेज़ कर दिया है। आज योग्यता से अधिक ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि कोई व्यक्ति खुद को कैसे पेश करता है और कितनी आकर्षक छवि बनाता है।
दिखावा तुरंत प्रभाव डालता है, लेकिन उसका असर अक्सर अल्पकालिक होता है। इसके विपरीत, सच्चा हुनर समय लेता है, पर उसका प्रभाव गहरा और स्थायी होता है।
यही कारण है कि बहुत से काबिल लोग देर से पहचान पाते हैं, जबकि कुछ लोग केवल बाहरी चमक के बल पर जल्दी आगे निकल जाते हैं। यह असंतुलन समाज की सोच को भी प्रभावित करता है।

दिखावे की यह संस्कृति अचानक नहीं बनी, बल्कि समय के साथ समाज की प्राथमिकताओं में आए बदलाव का परिणाम है। तेज़ रफ्तार जीवन में लोग गहराई से समझने के बजाय तुरंत प्रभावित होने वाली चीज़ों को चुनने लगे हैं।
आज सफलता का आकलन अक्सर वास्तविक योगदान से नहीं, बल्कि बाहरी छवि से किया जाता है। जो व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ खुद को प्रस्तुत करता है, उसकी बातों को अधिक गंभीरता से लिया जाता है, भले ही उसके पीछे ठोस कौशल न हो।
मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म ने इस सोच को और मजबूत किया है। यहां प्रतिभा से अधिक ट्रेंड, लाइक और दिखने वाली लोकप्रियता को महत्व दिया जाता है, जिससे दिखावा सामाजिक मानक बनता चला जाता है।
इस माहौल में सच्चे हुनरमंद लोग अक्सर हतोत्साहित हो जाते हैं। वे यह सोचने लगते हैं कि केवल मेहनत और कौशल पर्याप्त नहीं है, जब तक उसे सही ढंग से प्रदर्शित न किया जाए।
धीरे-धीरे यह स्थिति समाज में असंतुलन पैदा करती है, जहां मूल्य और प्रदर्शन के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। परिणामस्वरूप, वास्तविक गुणवत्ता को पहचानने की क्षमता कमजोर पड़ने लगती है।

इस वास्तविकता को समझना आवश्यक है कि दिखावा और हुनर एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि सही संतुलन में हों तो प्रभावी बन सकते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब केवल बाहरी प्रस्तुति को ही सफलता का पैमाना मान लिया जाता है।
समझदार व्यक्ति वही होता है जो अपने हुनर को निखारने के साथ-साथ उसे सही मंच और सही तरीके से प्रस्तुत करना भी सीख लेता है। ऐसा करने से उसकी योग्यता खोती नहीं, बल्कि सही लोगों तक पहुँच पाती है।
समाज को भी यह समझ विकसित करनी होगी कि तात्कालिक प्रभाव से अधिक दीर्घकालिक मूल्य महत्वपूर्ण होते हैं। जब हम गुणवत्ता, ईमानदारी और गहराई को महत्व देंगे, तब दिखावे की संस्कृति अपने आप कमजोर पड़ने लगेगी।
अंततः स्थायी सम्मान और वास्तविक सफलता उन्हीं को मिलती है जिनका हुनर समय की कसौटी पर खरा उतरता है। दिखावा क्षणिक चमक देता है, लेकिन सच्ची पहचान अंततः योग्यता से ही बनती है।

