
हम रोज़ कई काम बिना सोचे करते हैं।
मोबाइल उठाना, चाय पीना, नाखून चबाना।
ये आदतें कमज़ोरी नहीं होतीं।
ये दिमाग की सबसे शक्तिशाली कार्य प्रणाली का नतीजा होती हैं।
दिमाग ऊर्जा बचाने वाली मशीन है।
जो काम बार-बार दोहराया जाता है, दिमाग उसे अपने आप चलने देता है।
इसे ही आदत कहते हैं।
जब कोई व्यवहार पहली बार होता है, दिमाग को ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है।
लेकिन दोहराव के साथ न्यूरॉन्स के बीच एक स्थायी रास्ता बनने लगता है।
हर बार वही रास्ता थोड़ा और मज़बूत हो जाता है।
न्यूरोसाइंस अध्ययनों के अनुसार दिमाग का Basal Ganglia हिस्सा आदतों को संग्रहित करता है।
यही हिस्सा फैसले की ज़रूरत धीरे-धीरे खत्म कर देता है।
इसीलिए आदतें इतनी शक्तिशाली लगती हैं।
क्योंकि एक समय के बाद हम नहीं, हमारा दिमाग निर्णय ले रहा होता है।
इस पहले भाग में हमने समझा कि आदतें कैसे पैदा होती हैं।
अगले भाग में हम जानेंगे कि दिमाग आदतों को इनाम से कैसे जोड़ता है।

आदतें सिर्फ दोहराव से नहीं बनतीं।
दिमाग को एक चीज़ चाहिए — इनाम।
जब भी कोई काम हमें अच्छा लगता है, दिमाग उसे याद रखता है।
और अगली बार उसी अनुभव को फिर दोहराना चाहता है।
हर आदत तीन हिस्सों में बंटी होती है।
संकेत (Cue),
क्रिया (Action),
और इनाम (Reward)।
इसे ही Habit Loop कहा जाता है।
संकेत दिमाग को बताता है कि कुछ होने वाला है।
क्रिया वह व्यवहार है जो आप करते हैं।
और इनाम दिमाग को संदेश देता है — “यह अच्छा था।”
वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार इनाम के समय दिमाग Dopamine नामक रसायन छोड़ता है।
डोपामिन खुशी नहीं, बल्कि फिर से पाने की इच्छा पैदा करता है।
यही कारण है कि मोबाइल नोटिफिकेशन, मीठा खाना या सोशल मीडिया तेज़ी से आदत बन जाते हैं।
आदत का असली जाल इनाम में नहीं,
बल्कि इनाम की उम्मीद में छिपा होता है।
इसीलिए कई बार इनाम मिलने से पहले ही हम आदत दोहरा देते हैं।
अगले और अंतिम भाग में हम जानेंगे कि दिमाग पुरानी आदतें छोड़ना क्यों नहीं चाहता और उन्हें बदला कैसे जा सकता है।

सबसे कठिन सवाल यह नहीं है कि आदत कैसे बनती है।
सबसे कठिन सवाल है — वह जाती क्यों नहीं।
कई लोग नई आदतें बनाने की कोशिश करते हैं।
लेकिन पुरानी आदतें पीछा नहीं छोड़तीं।
इसका कारण आलस या कमजोरी नहीं है।
कारण है — दिमाग की सुरक्षा प्रणाली।
दिमाग उसी रास्ते पर चलता है जो उसे पहले से सुरक्षित लगता है।
भले ही वह आदत नुकसानदेह क्यों न हो।
न्यूरोसाइंस अध्ययनों में पाया गया है कि दिमाग पुराने न्यूरल पाथवे पूरी तरह मिटाता नहीं।
वह केवल नए रास्ते उनके ऊपर बनाता है।
इसी क्षमता को Neuroplasticity कहा जाता है।
इसका मतलब है —
आदत तोड़नी नहीं होती,
आदत बदलनी होती है।
जब आप संकेत वही रखते हैं लेकिन प्रतिक्रिया बदलते हैं,
तो दिमाग धीरे-धीरे नया रास्ता सीख लेता है।
इसीलिए केवल “छोड़ देना” काम नहीं करता।
लेकिन “उसकी जगह कुछ और करना” काम करता है।
जैसे —
तनाव में मोबाइल की जगह गहरी साँस।
बोरियत में स्क्रॉलिंग की जगह चलना।
दिमाग बदलाव से नहीं डरता,
वह अनिश्चितता से डरता है।
जब नया रास्ता सुरक्षित लगने लगता है,
तो पुरानी आदत अपने आप कमज़ोर पड़ जाती है।
आदतें आपकी पहचान नहीं हैं।
वे सिर्फ दिमाग द्वारा सीखे गए रास्ते हैं।
और रास्ते हमेशा बदले जा सकते हैं।

