एक सुनहरे दिन, गर्मियों का समय था, एक छोटे से गाँव में एक छोटा सा गरीब बच्चा नामक राजू रहता था। राजू के पास खुद का खेलने के लिए खिलौने नहीं थे, और उसके पास एक पुस्तक भी नहीं थी।
राजू के दिल में एक सपना था – वह पढ़ना चाहता था। वह हर दिन गाँव के स्कूल के बच्चों को पढ़ते देखकर अपना दिल दुखाता था। उसके पास पढ़ाई करने के लिए कुछ भी नहीं था, लेकिन वह उम्मीद नहीं हारा।
एक दिन, गाँव में एक सरकारी पुस्तकालय का परिचय हुआ। यह सुनकर राजू बहुत खुश हुआ क्योंकि उसे पढ़ाई करने के लिए पुस्तकें मिलेंगी।
राजू ने पुस्तकालय जाकर पुस्तकें लेने के लिए पूछा, लेकिन पुस्तकालय कर्मचारी ने उससे कुछ रुपये मांगे। राजू के पास तो कुछ भी नहीं था, लेकिन वह हारने का नाम नहीं लेना चाहता था।
राजू ने सोचा और उसने अपनी कई दिनों की भिख में जुटाया। जब उसके पास पर्याप्त रुपये आए, तो वह पुस्तकालय गया और पुस्तकें ली।
राजू ने उन पुस्तकों को पढ़ने का शुरू किया। वह रात-रात भर पढ़ता रहता था और अपने सपनों की ओर बढ़ता गया।
कुछ सालों बाद, राजू की मेहनत और संघर्ष ने उसे एक प्रमुख शिक्षाविद् बना दिया। वह अब अपने गाँव के बच्चों को पढ़ाने के लिए काम कर रहा था।
इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि सपनों की पूर्ति के लिए किसी भी संघर्ष को स्वागत करना चाहिए। राजू ने अपनी मेहनत और संघर्ष से अपने सपनों को पूरा किया और उसने दिखाया कि अगर आप मेहनत से कुछ करना चाहते हैं, तो आपके पास कुछ न होने पर भी यह संभव है।
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