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अंतरिक्ष में ऑक्सीजन न होने पर रॉकेट कैसे जलते हैं?

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब अंतरिक्ष में ऑक्सीजन नहीं होती, तो रॉकेट वहां कैसे जलते हैं। क्योंकि हम रोज़मर्रा के जीवन में आग को ऑक्सीजन से जुड़ा हुआ देखते हैं।

धरती पर आग जलने के लिए हवा में मौजूद ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, लेकिन रॉकेट का काम करने का सिद्धांत इससे अलग होता है। रॉकेट किसी बाहरी हवा पर निर्भर नहीं करता।

असल में रॉकेट अपने साथ केवल ईंधन ही नहीं, बल्कि ऑक्सीडाइज़र भी लेकर चलता है। ऑक्सीडाइज़र वह रसायन होता है जो ईंधन को जलाने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन प्रदान करता है।

जब ईंधन और ऑक्सीडाइज़र रॉकेट के इंजन में मिलते हैं, तो एक शक्तिशाली रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। इसी प्रतिक्रिया से अत्यधिक गर्म गैसें बनती हैं।

ये गर्म गैसें तेज़ी से पीछे की ओर निकलती हैं, जिससे न्यूटन के गति नियम के अनुसार रॉकेट आगे की ओर धक्का पाता है और अंतरिक्ष में भी आगे बढ़ता रहता है।


रॉकेट इंजन के भीतर ईंधन और ऑक्सीडाइज़र को अलग-अलग टैंकों में रखा जाता है। उड़ान के दौरान इन्हें नियंत्रित मात्रा में दहन कक्ष में भेजा जाता है।

दहन कक्ष में पहुँचते ही ईंधन और ऑक्सीडाइज़र तीव्र रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं। इस प्रक्रिया में अत्यधिक तापमान और दबाव उत्पन्न होता है, जिससे गर्म गैसें बनती हैं।

ये गैसें रॉकेट के नोज़ल से बहुत तेज़ गति से बाहर निकलती हैं। गैसों का यह तीव्र निष्कासन ही रॉकेट को आगे की दिशा में धक्का देता है।

यही कारण है कि रॉकेट को हवा या बाहरी ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती। उसकी पूरी ऊर्जा प्रणाली स्व-निर्भर होती है और अंतरिक्ष के निर्वात में भी समान रूप से कार्य करती है।

इस तकनीक के कारण रॉकेट पृथ्वी से बाहर निकलकर अंतरिक्ष में लंबी दूरी तय कर पाते हैं, जहां सामान्य दहन संभव नहीं होता।


रॉकेट के जलने की प्रक्रिया को अगर साधारण उदाहरण से समझें, तो यह सामान्य आग से बिल्कुल अलग होती है। मोमबत्ती या आग को जलने के लिए बाहर से ऑक्सीजन चाहिए, लेकिन रॉकेट अपना पूरा दहन तंत्र खुद साथ लेकर चलता है।

इसी कारण अंतरिक्ष के निर्वात में, जहां हवा बिल्कुल नहीं होती, वहां भी रॉकेट समान शक्ति से आगे बढ़ सकता है। उसकी गति और दिशा किसी बाहरी वातावरण पर निर्भर नहीं होती।

यही सिद्धांत अंतरिक्ष यानों, उपग्रह प्रक्षेपण और ग्रहों तक पहुँचने वाले मिशनों को संभव बनाता है। यदि रॉकेट को बाहरी ऑक्सीजन की आवश्यकता होती, तो अंतरिक्ष यात्रा कभी संभव ही नहीं हो पाती।

इस प्रकार रॉकेट का अंतरिक्ष में जलना विज्ञान की उस समझ का परिणाम है, जहां दहन को हवा से अलग करके नियंत्रित रासायनिक ऊर्जा में बदला गया है। यही तकनीक मानव को पृथ्वी से बाहर ब्रह्मांड की खोज करने की क्षमता देती है।


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