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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

आत्मा को अमर क्यों माना गया?

जब मनुष्य ने पहली बार मृत्यु को समझने की कोशिश की, तभी एक प्रश्न जन्मा—क्या सब कुछ शरीर के साथ ही समाप्त हो जाता है?

सभ्यताओं के इतिहास में लगभग हर संस्कृति ने इस प्रश्न का सामना किया है। शरीर नश्वर है—यह अनुभव स्पष्ट था। लेकिन चेतना, स्मृति, अनुभव और ‘मैं’ का भाव शरीर के नष्ट होने से भी आगे बढ़ता हुआ प्रतीत होता था।

यहीं से आत्मा की अवधारणा जन्म लेती है। आत्मा को शरीर से अलग, स्वतंत्र और शाश्वत माना गया—क्योंकि शरीर बदलता है, टूटता है, समाप्त होता है, लेकिन चेतना का अनुभव लगातार बना रहता है।

भारतीय दर्शन में आत्मा को न जन्म लेने वाला और न मरने वाला कहा गया। इसका कारण धार्मिक नहीं, बल्कि दार्शनिक था। जो वस्तु परिवर्तनशील है, वह नश्वर है—और जो परिवर्तन से परे है, वही अमर।

शरीर बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था से गुजरता है। लेकिन ‘मैं’ का अनुभव वही रहता है। यही निरंतरता आत्मा की अमरता का पहला संकेत मानी गई।

आत्मा को अमर मानने का एक बड़ा कारण कर्म का सिद्धांत भी बना। यदि जीवन केवल एक शरीर तक सीमित होता, तो कर्म और न्याय का संतुलन अधूरा रह जाता। आत्मा की निरंतरता ने इस नैतिक असंतुलन को अर्थ दिया।

आत्मा को अमर मानना मृत्यु से इनकार नहीं था—बल्कि मृत्यु को एक अवस्था मानना था। अंत नहीं, परिवर्तन।

यही कारण है कि मृत्यु को ‘यात्रा’ कहा गया, न कि ‘समाप्ति’।

इस पहले भाग में हम यह समझते हैं कि आत्मा की अमरता की अवधारणा कैसे शरीर और चेतना के अंतर से जन्मी।


आत्मा को अमर मानने की अवधारणा केवल एक संस्कृति या धर्म तक सीमित नहीं रही। अलग-अलग सभ्यताओं ने अलग शब्दों में, लेकिन लगभग समान भाव से इस सत्य को व्यक्त किया।

भारतीय दर्शन में आत्मा को शरीर, मन और बुद्धि से अलग माना गया। उपनिषदों में कहा गया कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है—वह केवल वस्त्र बदलती है। जैसे मनुष्य पुराने कपड़े त्यागकर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा देह बदलती है।

भगवद्गीता में यह विचार और स्पष्ट होता है। वहाँ आत्मा को अविनाशी कहा गया—जिसे न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है। यह कथन प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि दार्शनिक था—कि जो मूल तत्व है, वह भौतिक नियमों से परे है।

बौद्ध दर्शन आत्मा की स्थायी सत्ता को स्वीकार नहीं करता, लेकिन चेतना की निरंतर धारा को मानता है। यहाँ “आत्मा” नहीं, बल्कि “चेतना का प्रवाह” अमर है। मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक क्रम की अगली कड़ी है।

यूनानी दर्शन में प्लेटो ने आत्मा को शरीर से श्रेष्ठ और स्वतंत्र माना। उनके अनुसार शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा ज्ञान की दुनिया से जुड़ी है—इसलिए वह समय से परे है।

ईसाई और इस्लामी परंपराओं में आत्मा को ईश्वर द्वारा दी गई अमर सत्ता माना गया। शरीर नष्ट होता है, लेकिन आत्मा न्याय और उत्तरदायित्व के लिए जीवित रहती है।

इन सभी दर्शनों में एक बात समान है—आत्मा को अमर मानने का उद्देश्य मृत्यु का भय कम करना नहीं, बल्कि जीवन को अर्थ देना है।

यदि आत्मा अमर है, तो जीवन केवल भोग का साधन नहीं रहता—वह उत्तरदायित्व बन जाता है।

यही कारण है कि आत्मा की अमरता को नैतिकता, कर्म और न्याय से जोड़ा गया।

इस दूसरे भाग में हम देखते हैं कि कैसे विभिन्न दर्शन आत्मा को अलग-अलग शब्दों में, लेकिन एक ही गहराई से समझते हैं।


आधुनिक युग में जब विज्ञान ने पदार्थ के सबसे सूक्ष्म स्तर तक पहुँच बना ली, तब प्रश्न फिर उसी बिंदु पर लौट आया—चेतना कहाँ से आती है?

मस्तिष्क को समझ लेने के बाद भी विज्ञान यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि अनुभव करने वाला “मैं” कहाँ स्थित है। विचार उत्पन्न होते हैं, स्मृतियाँ बनती हैं, भावनाएँ उठती हैं—लेकिन इन सबको देखने वाला कौन है?

यहीं से आधुनिक चेतना-अध्ययन शुरू होता है। न्यूरोसाइंस यह स्वीकार करता है कि मस्तिष्क चेतना से जुड़ा है, लेकिन चेतना केवल मस्तिष्क की उपज है—यह सिद्ध नहीं किया जा सका।

Near-death experiences, गहरी ध्यान-अवस्थाएँ और आत्म-साक्षात्कार की रिपोर्टें इस प्रश्न को और जटिल बना देती हैं। अनेक लोग बताते हैं कि शरीर निष्क्रिय होने पर भी अनुभव बना रहता है।

विज्ञान इन अनुभवों को पूरी तरह न स्वीकार करता है, न नकारता है। वह केवल इतना मानता है कि चेतना अभी भी “अधूरी तरह समझी गई वास्तविकता” है।

यही बिंदु प्राचीन दर्शन और आधुनिक विज्ञान को एक ही प्रश्न पर खड़ा कर देता है—क्या चेतना किसी रूप में शरीर से स्वतंत्र है?

आत्मा को अमर मानने की धारणा इसलिए बनी रही क्योंकि वह मानव अनुभव से मेल खाती रही। मृत्यु के बावजूद अर्थ, स्मृति और पहचान की निरंतरता महसूस की जाती रही।

यह विश्वास केवल सांत्वना नहीं था। यह एक नैतिक ढाँचा था—जिसमें कर्म, उत्तरदायित्व और आत्मचिंतन को केंद्रीय स्थान मिला।

यदि आत्मा नश्वर होती, तो जीवन केवल एक जैविक दुर्घटना बन जाता। लेकिन अमर आत्मा की धारणा जीवन को उद्देश्य देती है।

आधुनिक मानव भले ही शब्द बदल दे—चेतना, आत्म-अनुभूति, awareness—लेकिन मूल प्रश्न वही रहता है।

इसलिए आत्मा की अमरता आज भी एक जीवित विचार है। वह विज्ञान से टकराती नहीं, बल्कि उसे आगे सोचने को मजबूर करती है।

आत्मा को अमर इसलिए माना गया क्योंकि मानव ने स्वयं को केवल शरीर से बड़ा अनुभव किया।

और जब तक यह अनुभव बना रहेगा, तब तक आत्मा की अमरता का प्रश्न भी जीवित रहेगा।

शायद आत्मा अमर है या नहीं—यह अंतिम उत्तर नहीं, बल्कि अंतिम खोज है।

और यही खोज मानव को केवल जीवित नहीं, बल्कि जागरूक बनाती है।


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