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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

गणित की यह पहेली 10 में से 9 लोगों को फेल कर देती है

एक आसान सवाल… जो दिमाग़ को चकमा दे देता है

यह पहेली दिखने में बेहद आसान लगती है।

न कोई लंबा गणित, न कोई भारी फ़ॉर्मूला।

फिर भी जैसे ही लोग जवाब देते हैं— अधिकांश लोग गलत हो जाते हैं।

10 में से 9 लोग क्यों फेल हो जाते हैं?

क्योंकि यह पहेली गणित की नहीं—

सोचने के तरीके की परीक्षा लेती है।

हमारा दिमाग़ जल्दी उत्तर ढूँढना चाहता है।

वह सवाल पूरा समझने से पहले एक जवाब चुन लेता है।

दिमाग़ का शॉर्टकट मोड

वैज्ञानिकों के अनुसार मानव मस्तिष्क अक्सर “शॉर्टकट” अपनाता है।

इसे कहा जाता है— Intuitive Thinking

यह रोज़मर्रा में मदद करता है,

लेकिन पहेलियों में यही सबसे बड़ी गलती बन जाता है।

यही कारण है कि पढ़े-लिखे लोग भी चूक जाते हैं

इसका IQ से कोई सीधा संबंध नहीं है।

डॉक्टर, इंजीनियर, यहाँ तक कि गणित पढ़ाने वाले लोग भी इसमें फँस जाते हैं।

क्योंकि सवाल दिमाग़ को गलत दिशा में सोचने पर मजबूर करता है।

यह पहेली हमें क्या सिखाती है?

यह बताती है कि हम कितनी जल्दी निष्कर्ष निकाल लेते हैं।

और यही आदत केवल गणित में नहीं—

ज़िंदगी के फैसलों में भी हमें गलती करवाती है।

अगले भाग में हम इस पहेली को खुद हल करेंगे—

और समझेंगे कि दिमाग़ गलती कहाँ करता है।


अब आती है असली पहेली

🧠 पहेली: ध्यान से पढ़िए

एक आदमी दुकान पर जाता है।

वह ₹100 देकर ₹70 की चीज़ खरीदता है।
दुकानदार के पास खुले पैसे नहीं होते,
तो वह पड़ोसी से ₹50 उधार लेकर ग्राहक को ₹30 वापस कर देता है।

अब स्थिति यह है 👇

  • ग्राहक को ₹30 वापस मिले
  • दुकानदार ने पड़ोसी को ₹50 लौटा दिए

❓ सवाल:
दुकानदार को कुल कितने का नुकसान हुआ?

🤔 ज़्यादातर लोग यहाँ गलती करते हैं

अक्सर लोग सोचते हैं:

₹70 (सामान) + ₹30 (वापसी) = ₹100
फिर ₹50 जोड़ देते हैं और कन्फ्यूज़ हो जाते हैं 😵‍💫

✅ सही जवाब (थोड़ा सोचिए)

👉 दुकानदार ने ग्राहक को दिया:

  • ₹70 की चीज़
  • ₹30 नकद

👉 कुल दिया = ₹100

👉 दुकानदार को ग्राहक से मिले = ₹100

👉 लेकिन ₹50 तो उसे पड़ोसी को लौटाने पड़े

📌 असल नुकसान = ₹50

🔑 सीख

गलत जोड़–घटाव नहीं,
सही जगह पर गणित लगाना ही असली दिमाग़ की परीक्षा है 😉

यही वह सवाल है जिसे देखकर लोग मुस्कुरा देते हैं।

उन्हें लगता है— “यह तो बहुत आसान है।”

और यहीं दिमाग़ फँसता है।

पहली नज़र में दिमाग़ क्या करता है?

हमारा दिमाग़ पूरा सवाल नहीं पढ़ता।

वह केवल पहले दिखने वाले नंबरों और पैटर्न को पकड़ लेता है।

इसे वैज्ञानिक भाषा में कॉग्निटिव शॉर्टकट कहा जाता है।

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार

वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार मानव मस्तिष्क दो तरह से सोचता है।

पहला— तेज़, सहज और भावनात्मक।

दूसरा— धीमा, तार्किक और विश्लेषणात्मक।

इस पहेली में 90% लोग पहले मोड पर ही उत्तर दे देते हैं।

यही वजह है कि गलती होती है

दिमाग़ मान लेता है कि पैटर्न पहले जैसा ही होगा।

वह यह जाँचने की ज़रूरत महसूस ही नहीं करता कि कहीं कोई जाल तो नहीं।

और यही इस पहेली की सबसे बड़ी चाल है।

यह सिर्फ़ गणित नहीं है

यही व्यवहार हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी करते हैं।

जल्दी फैसला, आधा सच, और पूरा भरोसा।

इसलिए यह पहेली केवल नंबर नहीं—

मानव सोच का आईना है।

अगले भाग में हम इसे धीरे-धीरे हल करेंगे—

और दिखाएँगे कि सही उत्तर कहाँ छिपा है।


अब सही उत्तर समझिए

जब हम धीरे रुकते हैं और सवाल को फिर से पढ़ते हैं—

तभी असली गणित दिखाई देता है।

यह पहेली तेज़ जवाब नहीं,

ध्यान माँगती है।

गलती कहाँ हुई थी?

हमने मान लिया था कि हर स्टेप पहले जैसा ही होगा।

लेकिन एक जगह नियम बदल गया था—

और दिमाग़ उसे नोटिस ही नहीं करता।

वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया

वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि मानव मस्तिष्क “पैटर्न पूरा करने” का आदी होता है।

जब उसे कोई पहचाना हुआ ढांचा दिखता है,

तो वह जाँच करना छोड़ देता है।

इसी वजह से यह पहेली 10 में से 9 लोगों को गलत कर देती है।

सही उत्तर कैसे निकलता है?

जब हर स्टेप को अलग-अलग तर्क से देखा जाए,

और यह मान लिया जाए कि कुछ भी “अपने आप सही” नहीं है—

तभी सही समाधान साफ़ दिखाई देता है।

यह पहेली हमें क्या सिखाती है?

यह सिर्फ़ गणित नहीं—

यह चेतावनी है।

तेज़ सोच हमेशा सही नहीं होती।

कभी-कभी रुककर सोचना सबसे बुद्धिमान फैसला होता है।

निष्कर्ष

अगर आप इस पहेली में फँसे—

तो आप अकेले नहीं हैं।

यही कारण है कि यह सवाल इतना मशहूर है।

क्योंकि यह नंबर नहीं,

मानव दिमाग़ को परखता है।


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