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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

क्या इंसान के पास छठी इंद्रिय होती है?

क्या आपने कभी बिना किसी कारण कुछ महसूस किया है?

एक अचानक डर, या यह अहसास कि कुछ गलत होने वाला है।

कई लोग इसे छठी इंद्रिय कहते हैं।

लेकिन सवाल यह है — क्या यह सच में कोई अलग इंद्रिय है?

इंसान के पास पाँच इंद्रियाँ होती हैं —

देखना, सुनना, सूँघना, स्वाद लेना और स्पर्श।

फिर भी कई बार हम ऐसी चीज़ें महसूस कर लेते हैं

जो आँखों से न दिखतीं और कानों से न सुनाई देतीं।

कभी किसी अनजान जगह जाते ही असहज महसूस होना,

या किसी व्यक्ति से बिना कारण सावधान हो जाना —

ये अनुभव लगभग हर इंसान ने महसूस किए हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यह अनुभव कल्पना नहीं होते।

दिमाग बहुत तेज़ी से संकेतों को प्रोसेस करता है।

तो क्या यह छठी इंद्रिय है?

या फिर दिमाग का कोई छिपा हुआ तंत्र?

इस लेख में हम विज्ञान के आधार पर इस रहस्य को परत-दर-परत समझेंगे।


जिसे हम छठी इंद्रिय कहते हैं,

वह असल में दिमाग की तेज़ प्रोसेसिंग क्षमता हो सकती है।

इंसानी दिमाग हर पल हज़ारों संकेत इकट्ठा करता है।

चेहरे के हाव-भाव, आवाज़ का उतार-चढ़ाव, शरीर की मुद्रा —

हम इन्हें जानबूझकर नहीं देखते,

लेकिन अवचेतन दिमाग इन्हें तुरंत समझ लेता है।

यही कारण है कि कभी-कभी हमें लगता है —

“कुछ ठीक नहीं है” जबकि हम ठीक-ठीक कारण नहीं बता पाते।

न्यूरोसाइंस शोधों के अनुसार दिमाग खतरे को पहचानने में होश से कई गुना तेज़ होता है।

यह प्रक्रिया मिलीसेकंड्स में हो जाती है।

दिमाग का एक हिस्सा —

अमिगडाला भावनाओं और खतरे की पहचान का केंद्र है।

यह हिस्सा तर्क करने से पहले ही प्रतिक्रिया शुरू कर देता है।

इसीलिए हम खतरे को “महसूस” करते हैं समझने से पहले।

किसी सुनसान रास्ते पर अचानक डर लगना —

यह कल्पना नहीं, बल्कि दिमाग की चेतावनी होती है।

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि यह अनुभव जीवित रहने की प्राकृतिक प्रणाली का हिस्सा है।

आदिम मानव के लिए यही क्षमता जीवन और मृत्यु का अंतर बनती थी।

तो क्या यह सच में छठी इंद्रिय है?

या बेहद प्रशिक्षित दिमाग का स्वाभाविक परिणाम?

अगले और अंतिम भाग में हम जानेंगे —

विज्ञान इस विषय पर अंततः क्या कहता है।


तो सवाल अब भी वही है —

क्या इंसान के पास वाकई छठी इंद्रिय होती है?

विज्ञान के अनुसार इंसान के पास छह अलग इंद्रियाँ नहीं होतीं।

लेकिन दिमाग की क्षमता इतनी विकसित है कि वह हमें ऐसा अनुभव दे सकती है।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इंसानी दिमाग पिछले अनुभवों, स्मृतियों और संकेतों को बहुत तेज़ी से जोड़ता है।

यह प्रक्रिया इतनी तेज़ होती है कि हमें लगता है —

हमने बिना सोचे कुछ जान लिया।

असल में यह कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं,

बल्कि दिमाग की उन्नत गणना प्रणाली है।

जिसे हम “अंतर्ज्ञान” या “गट फीलिंग” कहते हैं।

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि अनुभवी लोग इस क्षमता को ज़्यादा महसूस करते हैं।

क्योंकि उनका दिमाग पहले से अनेक पैटर्न पहचानना सीख चुका होता है।

इसलिए हर अजीब एहसास सच नहीं होता,

लेकिन हर एहसास कल्पना भी नहीं होता।

छठी इंद्रिय कोई नई इंद्रिय नहीं,

बल्कि दिमाग की गहराई में चल रही तेज़ समझ है।

जो हमें खतरे से बचाती है, निर्णय लेने में मदद करती है और कभी-कभी हैरान भी कर देती है।

विज्ञान रहस्य को नकारता नहीं,

बल्कि उसे समझने की कोशिश करता है।

और शायद यही वजह है कि इंसानी दिमाग आज भी सबसे बड़ा रहस्य बना हुआ है।


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