
भांग शायद दुनिया का सबसे विवादास्पद पौधा है। एक ही पदार्थ को कहीं नशा माना गया, कहीं पवित्र प्रसाद, और कहीं आधुनिक चिकित्सा की संभावनाओं से भरा औषधीय तत्व।
समस्या भांग में नहीं है—समस्या हमारी परिभाषाओं में है।
इतिहास बताता है कि भांग मानव सभ्यता के साथ हज़ारों वर्षों से जुड़ी रही है। यह अचानक आधुनिक समाज में पैदा हुआ कोई खतरनाक नशा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और चिकित्सीय परंपराओं का हिस्सा रहा है।
प्राचीन भारत में भांग को औषधि माना गया। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसका उल्लेख पाचन सुधारने, दर्द कम करने और मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए किया गया। वहीं धार्मिक संदर्भों में यह संयम और ध्यान से जुड़ी हुई रही।
लेकिन समय के साथ परिप्रेक्ष्य बदल गया। औपनिवेशिक शासन, आधुनिक कानून और “नशा” की नई परिभाषाओं ने भांग को एक खतरे के रूप में देखना शुरू किया।
यहीं से भ्रम पैदा हुआ।
भांग, गांजा और चरस—तीनों को एक ही श्रेणी में रख दिया गया, जबकि जैविक और प्रभाव के स्तर पर ये तीनों समान नहीं हैं।
भांग मुख्यतः पत्तियों से बनती है। इसका प्रभाव सीमित और नियंत्रित होता है, जबकि गांजा और चरस में सक्रिय तत्वों की मात्रा अधिक होती है। लेकिन कानून ने इन भेदों को लंबे समय तक अनदेखा किया।
इसका परिणाम यह हुआ कि समाज ने भांग को या तो पूरी तरह पवित्र माना, या पूरी तरह अपराध। बीच की वैज्ञानिक समझ कहीं खो गई।
आधुनिक विज्ञान ने जब भांग के रासायनिक घटकों का अध्ययन शुरू किया, तब पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि यह केवल नशा पैदा करने वाला पदार्थ नहीं है।
मानव शरीर में पहले से मौजूद जैविक प्रणालियाँ भांग के कुछ तत्वों पर प्रतिक्रिया करती हैं। यह संयोग नहीं, बल्कि विकास की कहानी का हिस्सा है।
यहीं से भांग को “दवा” के रूप में देखने की प्रक्रिया शुरू हुई—न कि विश्वास के आधार पर, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ।
लेकिन समाज अभी भी दो ध्रुवों में बँटा हुआ है।
एक ओर वह वर्ग है जो भांग को सामाजिक पतन का कारण मानता है। दूसरी ओर वह वर्ग है जो इसे चमत्कारी औषधि के रूप में प्रस्तुत करता है।
सच्चाई इन दोनों के बीच है।
भांग न तो पूर्णतः सुरक्षित है, न ही पूर्णतः खतरनाक। उसका प्रभाव मात्रा, उपयोग, व्यक्ति और उद्देश्य पर निर्भर करता है।

भांग को केवल नशे के चश्मे से देखना एक ऐतिहासिक और वैज्ञानिक भूल है। वास्तविकता यह है कि भांग उन गिनी-चुनी प्राकृतिक वनस्पतियों में से है, जिन पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान गंभीरता से शोध कर रहा है।
भांग में पाए जाने वाले सक्रिय रासायनिक यौगिकों को कैनाबिनॉइड्स कहा जाता है। इनमें प्रमुख रूप से THC और CBD शामिल हैं। THC वह तत्व है जो नशे से जुड़ा है, जबकि CBD का मनोवैज्ञानिक प्रभाव नहीं होता और वही चिकित्सा उपयोगों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
आधुनिक अनुसंधान यह स्पष्ट करता है कि भांग सीधे दर्द को दबाती नहीं, बल्कि मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र में दर्द की व्याख्या करने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। यही कारण है कि यह पुरानी पीड़ा, न्यूरोपैथिक पेन और कैंसर-संबंधी दर्द में सहायक पाई गई है।
मेडिकल साइंस में भांग का सबसे महत्वपूर्ण योगदान न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में सामने आया है। मिर्गी के कुछ दुर्लभ और गंभीर मामलों में, जहाँ पारंपरिक दवाएँ विफल हो जाती हैं, वहाँ CBD आधारित उपचारों ने आशाजनक परिणाम दिखाए हैं।
इसके अतिरिक्त, भांग का उपयोग मांसपेशियों के अनैच्छिक संकुचन, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, पार्किंसंस जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों में भी अध्ययनाधीन है। यहाँ उद्देश्य नशा नहीं, बल्कि तंत्रिका संकेतों को संतुलित करना होता है।
मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में भांग एक जटिल विषय है। नियंत्रित और चिकित्सकीय खुराक में यह चिंता और PTSD जैसे विकारों में सहायक हो सकती है, लेकिन अनियंत्रित उपयोग इसके विपरीत प्रभाव भी उत्पन्न कर सकता है। यही अंतर दवा और नशे की रेखा खींचता है।
यही कारण है कि चिकित्सा विज्ञान भांग को “उपचार योग्य पदार्थ” के रूप में देखता है, न कि सामाजिक आदत के रूप में। प्रयोगशाला में नियंत्रित मात्रा, शुद्ध अर्क और चिकित्सकीय निगरानी—ये सभी इसके वैज्ञानिक उपयोग की अनिवार्य शर्तें हैं।
आधुनिक चिकित्सा यह स्वीकार करती है कि भांग न तो पूर्ण समाधान है और न ही पूर्ण समस्या। वह एक औजार है, जिसका मूल्य उसके उपयोग के तरीके से तय होता है।

भांग को लेकर समाज का सबसे बड़ा संघर्ष इसका वैज्ञानिक स्वरूप नहीं, बल्कि इसका सामाजिक और कानूनी अर्थ है। यही कारण है कि भांग आज भी दवा और नशे के बीच फँसी हुई है।
भारत जैसे देशों में भांग का ऐतिहासिक उपयोग धार्मिक और आयुर्वेदिक परंपराओं से जुड़ा रहा है। इसके बावजूद आधुनिक कानून इसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि अनियंत्रित उपयोग ने सामाजिक समस्याएँ भी पैदा की हैं।
कानून भांग के पौधे और उससे निकले उत्पादों के बीच स्पष्ट अंतर नहीं कर पाता। यही भ्रम चिकित्सा शोध और जनस्वास्थ्य नीति के बीच टकराव पैदा करता है।
जहाँ एक ओर वैज्ञानिक समुदाय नियंत्रित कैनाबिनॉइड्स को संभावित औषधि मानता है, वहीं दूसरी ओर समाज इसका दुरुपयोग देखकर इसे पूरी तरह खारिज करने की माँग करता है।
यह टकराव इस तथ्य को उजागर करता है कि किसी भी शक्तिशाली पदार्थ का मूल्य उसके नियंत्रण में होता है, न कि उसके अस्तित्व में।
भविष्य में भांग का स्थान दवा के रूप में तभी सुरक्षित होगा, जब स्पष्ट नियम, चिकित्सकीय निगरानी और सार्वजनिक जागरूकता साथ-साथ आगे बढ़ें।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश भांग-आधारित दवाओं को सीमित रूप में स्वीकार कर चुके हैं। यह संकेत है कि विज्ञान धीरे-धीरे नीति को दिशा दे रहा है, न कि भावनात्मक प्रतिक्रिया।
नैतिक दृष्टि से भी प्रश्न सरल नहीं है। क्या किसी पदार्थ को इसलिए अस्वीकार किया जाए क्योंकि उसका दुरुपयोग संभव है? या उसे नियंत्रित कर लाभ उठाया जाए?
इतिहास बताता है कि समाज ने हर नई चिकित्सा खोज के साथ यही संघर्ष किया है—चाहे वह एनेस्थीसिया हो, मॉर्फिन हो या आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य दवाएँ।
भांग भी उसी संक्रमण काल से गुजर रही है, जहाँ ज्ञान और डर आमने-सामने खड़े हैं।
इस अंतिम भाग में स्पष्ट होता है कि भांग न तो पूर्ण नशा है, न पूर्ण औषधि। वह एक जैव-रासायनिक संभावना है, जिसे मानव विवेक दिशा दे सकता है।
अंततः प्रश्न भांग का नहीं, बल्कि हमारे निर्णय लेने के तरीके का है।
जहाँ विज्ञान मार्गदर्शन देता है, वहाँ समाज को संतुलन सीखना होता है।
और यही संतुलन तय करेगा कि भांग भविष्य में दवा बनेगी या विवाद।

