
हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में थर्मस का उपयोग करते हैं—कभी चाय को गर्म रखने के लिए, तो कभी पानी को ठंडा रखने के लिए। लेकिन अक्सर हम यह नहीं सोचते कि एक ही बोतल दो बिल्कुल उलटे काम कैसे कर सकती है।
थर्मस कोई “ताप पैदा करने वाला” यंत्र नहीं है। न ही यह ठंडक उत्पन्न करता है। इसका पूरा काम केवल इतना है—अंदर मौजूद तापमान को बाहर की दुनिया से अलग रखना।
इस प्रश्न को समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना होगा कि गर्मी या ठंड वास्तव में कैसे फैलती है।
भौतिकी के अनुसार, ऊष्मा तीन तरीकों से स्थानांतरित होती है—चालन (Conduction), संवहन (Convection) और विकिरण (Radiation)।
यदि इन तीनों मार्गों को रोक दिया जाए, तो तापमान लगभग स्थिर बना रहता है। थर्मस की पूरी डिजाइन इसी सिद्धांत पर आधारित है।
एक साधारण बोतल में केवल एक दीवार होती है। यदि उसमें गर्म चाय डाली जाए, तो गर्मी दीवार के ज़रिए बाहर चली जाती है। यदि ठंडा पानी हो, तो बाहर की गर्मी अंदर प्रवेश कर जाती है।
थर्मस यहाँ अलग रास्ता अपनाता है। इसमें एक नहीं, बल्कि दो दीवारें होती हैं—और इन दोनों दीवारों के बीच लगभग पूर्ण निर्वात (Vacuum) होता है।
निर्वात का अर्थ है—लगभग कोई कण नहीं। और जहाँ कण नहीं होते, वहाँ चालन और संवहन दोनों असंभव हो जाते हैं।
यानी न तो अंदर की गर्मी बाहर जा पाती है, और न ही बाहर की गर्मी अंदर आ पाती है।
अब बचता है तीसरा मार्ग—विकिरण। थर्मस की अंदरूनी सतह को चमकदार (reflective) बनाया जाता है, ताकि ऊष्मा तरंगें वापस अंदर की ओर ही परावर्तित हो जाएँ।
इस प्रकार थर्मस ऊष्मा के तीनों रास्तों को लगभग पूरी तरह बंद कर देता है।
यही कारण है कि गर्म पदार्थ गर्म ही रहता है और ठंडा पदार्थ ठंडा। थर्मस कोई जादू नहीं करता—वह केवल भौतिकी के नियमों का बेहद समझदारी से उपयोग करता है।
इस पहले भाग में हमने समझा कि थर्मस का मूल सिद्धांत क्या है और ऊष्मा-स्थानांतरण को रोकना क्यों इतना प्रभावी होता है।

थर्मस की असली ताकत केवल उसकी दोहरी दीवारों में नहीं, बल्कि उसकी पूरी संरचना में छिपी होती है। यदि केवल निर्वात ही पर्याप्त होता, तो हर बोतल थर्मस बन सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं है—क्योंकि सबसे बड़ा ताप-नुकसान अक्सर ढक्कन से होता है।
इसीलिए थर्मस का ढक्कन साधारण नहीं होता। यह हवा को अंदर–बाहर जाने से रोकने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया जाता है।
ढक्कन के भीतर रबर या सिलिकॉन की गैसकेट लगी होती है, जो बोतल के मुँह को पूरी तरह सील कर देती है। इससे संवहन (Convection) लगभग समाप्त हो जाता है।
यदि ढक्कन ठीक से बंद न हो, तो अंदर की गर्म हवा ऊपर उठकर बाहर निकलने लगती है—और ठंडी हवा अंदर घुस जाती है। यही कारण है कि ढक्कन खुलते ही थर्मस जल्दी प्रभाव खो देता है।
थर्मस की सामग्री भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अधिकतर अच्छे थर्मस स्टेनलेस स्टील से बनाए जाते हैं। इसका कारण यह है कि स्टील मज़बूत होने के साथ-साथ अपेक्षाकृत कम ऊष्मा का चालन करता है।
भीतरी सतह को अक्सर दर्पण जैसा चमकदार बनाया जाता है। इसका उद्देश्य विकिरण (Radiation) को वापस अंदर की ओर परावर्तित करना होता है।
इसका मतलब यह है कि गर्म तरल की ऊष्मा दीवार से टकराकर वापस तरल की ओर लौट आती है, बाहर नहीं जाती।
अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या थर्मस हमेशा तापमान को बिल्कुल स्थिर रख सकता है?
उत्तर है—नहीं। थर्मस ऊष्मा को रोकता है, लेकिन उसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता। समय के साथ थोड़ी-बहुत ऊष्मा का आदान-प्रदान होता ही है।
जितना अच्छा निर्वात, जितनी बेहतर सीलिंग और जितनी कम बार ढक्कन खोला जाएगा—थर्मस उतना अधिक प्रभावी रहेगा।
यही कारण है कि थर्मस में बार-बार ढक्कन खोलने पर चाय जल्दी ठंडी हो जाती है या ठंडा पानी धीरे-धीरे सामान्य तापमान की ओर बढ़ने लगता है।
थर्मस तापमान को “बनाए” नहीं रखता—वह केवल परिवर्तन की गति को बेहद धीमा कर देता है।
यही वैज्ञानिक सच्चाई उसे इतना प्रभावी बनाती है।
इस दूसरे भाग में हमने देखा कि ढक्कन, सामग्री और संरचना थर्मस को व्यावहारिक रूप से कैसे काम करने योग्य बनाते हैं।

थर्मस को लेकर सबसे आम गलतफहमी यह है कि वह चीज़ों को “हमेशा” गर्म या ठंडा रख सकता है। वास्तविकता इससे थोड़ी अलग है।
थर्मस तापमान को स्थायी नहीं बनाता—वह केवल तापमान बदलने की गति को बहुत धीमा कर देता है। समय के साथ ऊष्मा का आदान-प्रदान होता ही है, चाहे वह कितना भी कम क्यों न हो।
इसीलिए यदि कोई कहता है कि उसका थर्मस 24 घंटे तक बिल्कुल गर्म रखता है, तो यह आंशिक सत्य होता है। तापमान गिरता है—बस इतनी धीरे कि हमें तुरंत महसूस नहीं होता।
एक और आम भ्रम यह है कि थर्मस खुद गर्मी या ठंड पैदा करता है। वास्तव में वह न तो हीटर है और न ही कूलर। जो तापमान आप अंदर डालते हैं, वही वह बचाने की कोशिश करता है।
यदि आप गुनगुना पानी थर्मस में डालेंगे, तो वह गुनगुना ही रहेगा—न ज्यादा गर्म होगा, न ज्यादा ठंडा।
थर्मस की कार्यक्षमता उसके उपयोग पर भी निर्भर करती है। बार-बार ढक्कन खोलना, ढक्कन ढीला रखना, या थर्मस को पूरी तरह न भरना—ये सभी चीज़ें उसकी क्षमता को कम कर देती हैं।
खाली जगह में हवा भर जाती है, जो धीरे-धीरे ऊष्मा स्थानांतरण का रास्ता बना देती है। इसलिए थर्मस को लगभग पूरा भरना अधिक प्रभावी होता है।
गर्म चीज़ों के लिए थर्मस को पहले गरम पानी से और ठंडी चीज़ों के लिए ठंडे पानी से “प्री-कंडीशन” करना भी उपयोगी होता है।
इससे अंदर की दीवारें पहले ही उस तापमान के करीब पहुँच जाती हैं, जिसे आप सुरक्षित रखना चाहते हैं।
थर्मस की असली खूबी उसकी सादगी में है। वह कोई जटिल मशीन नहीं, बल्कि ऊष्मा के नियमों का व्यावहारिक उपयोग है।
यही कारण है कि एक साधारण-सा दिखने वाला थर्मस दशकों से लगभग उसी सिद्धांत पर काम कर रहा है—और आज भी उतना ही प्रभावी है।
इस पूरे लेख में हमने देखा कि थर्मस कैसे ऊष्मा के तीनों मार्गों को रोकता है, कैसे उसकी बनावट उसे प्रभावी बनाती है, और किन सीमाओं के भीतर वह काम करता है।
अंततः थर्मस हमें यह सिखाता है कि सही समझ और सही उपयोग से साधारण विज्ञान भी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बेहद सुविधाजनक बना सकता है।
यही वजह है कि थर्मस कोई जादू नहीं—बल्कि समझदार विज्ञान है।

