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रबीन्द्रनाथ टैगोर

कवि

रबीन्द्रनाथ टैगोर (७ मई, १८६१ – ७ अगस्त, १९४१) - विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं - भारत का राष्ट्र-गान 'जन गण मन' और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान 'आमार सोनार बांङ्ला' गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

गांधारी ने अपनी आंखों पर पट्टी क्यों बांधी?

महाभारत की सबसे रहस्यमयी और गलत समझी गई स्त्रियों में गांधारी का स्थान विशेष है। सामान्यतः कहा जाता है कि उसने अपने पति धृतराष्ट्र के अंधेपन के कारण अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। लेकिन यह उत्तर आधा है—और महाभारत कभी आधे उत्तरों की कथा नहीं रही।

गांधारी का निर्णय करुणा से अधिक अनुशासन से जन्मा था। यह सहानुभूति नहीं, बल्कि आत्म-संयम का संकल्प था।

गांधारी जानती थीं कि धृतराष्ट्र जन्म से अंधे हैं। लेकिन वह यह भी जानती थीं कि सत्ता, दृष्टि और विवेक—तीनों एक साथ चलें, यह आवश्यक नहीं। अंधापन केवल आँखों का नहीं होता।

अपने विवाह के बाद गांधारी के सामने दो विकल्प थे। पहला—राजमहल की सुविधा, दृश्य वैभव और सत्ता का सुख। दूसरा—एक ऐसा जीवन, जहाँ वह स्वयं को सीमित कर पति के अनुभव के समकक्ष खड़ा कर सके।

गांधारी ने दूसरा मार्ग चुना।

यह निर्णय त्याग का प्रतीक नहीं था, बल्कि समानता का था। गांधारी ने यह नहीं कहा कि “मैं तुम्हारे दुःख को देखना नहीं चाहती”, बल्कि यह कहा—“मैं तुम्हारे संसार को वही बनाकर जियूँगी।”

महाभारत में यह पहला संकेत है कि गांधारी साधारण रानी नहीं हैं। वह जानती थीं कि जो देखता है, वही निर्णय को प्रभावित करता है। दृष्टि सत्ता देती है—और सत्ता अहंकार।

गांधारी ने अपनी दृष्टि त्यागकर स्वयं को निष्पक्ष बनाने का प्रयास किया। उन्होंने यह स्वीकार किया कि यदि वह सब कुछ देखती रहेंगी, तो निर्णयों में हस्तक्षेप करेंगी—और वह भूमिका उन्होंने नहीं चुनी।

यहाँ एक गहरा राजनीतिक बोध छिपा है। गांधारी ने स्वयं को सत्ता के दृश्य प्रभाव से दूर रखा, ताकि वह नैतिक साक्षी बनी रह सकें, न कि सक्रिय हस्तक्षेपकर्ता।

उनकी पट्टी मौन की भाषा थी। यह कहना था—“मैं देख सकती हूँ, लेकिन चुनती हूँ कि न देखूँ।”

यह कोई भावनात्मक आवेग नहीं था। यह आजीवन निभाया गया व्रत था—जो केवल मानसिक दृढ़ता से संभव है।

महाभारत में बहुत से पात्र दृष्टि रखते हुए भी अंधे हैं। गांधारी एकमात्र पात्र हैं, जो दृष्टि होते हुए भी स्वेच्छा से अंधकार चुनती हैं—और यही उन्हें सबसे अधिक देखने वाली बनाता है।

इस पहले भाग में यह स्पष्ट होता है कि गांधारी की पट्टी करुणा नहीं, चरित्र का निर्णय थी।


गांधारी की आँखों पर पट्टी केवल उनके वैवाहिक निर्णय तक सीमित नहीं रहती—वह उनके मातृत्व को भी आकार देती है। महाभारत में गांधारी एक ऐसी माँ हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को देखा नहीं, लेकिन उन्हें समझने का दावा भी कभी नहीं किया।

यहाँ गांधारी की सबसे बड़ी त्रासदी छिपी है। उन्होंने स्वयं को सत्ता के दृश्य प्रभाव से दूर रखा, लेकिन इसी दूरी ने उन्हें अपने पुत्रों के नैतिक पतन से भी दूर कर दिया।

गांधारी अपने पुत्रों को प्रेम करती थीं, लेकिन उनका प्रेम हस्तक्षेपकारी नहीं था। उन्होंने उन्हें दिशा देने के बजाय, उन्हें उनके कर्मों के साथ छोड़ दिया। यह स्वतंत्रता थी—लेकिन संरक्षण नहीं।

दुर्योधन का चरित्र इसी शून्य में आकार लेता है। जहाँ कर्ण को दुर्योधन का समर्थन मिला, वहाँ दुर्योधन को नैतिक प्रतिरोध नहीं मिला। गांधारी की मौन उपस्थिति उसके लिए मार्गदर्शक नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष स्वीकृति बन गई।

महाभारत यह नहीं कहती कि गांधारी अपने पुत्रों के अधर्म से अनजान थीं। वह जानती थीं—लेकिन उन्होंने देखना नहीं चुना। यही अंतर निर्णायक है।

जब द्यूतसभा में द्रौपदी का अपमान होता है, तब गांधारी वहाँ नहीं होतीं। लेकिन उनका मौन उस सभा से अधिक भारी है। यह वह क्षण है जहाँ नैतिक साक्षी को बोलना चाहिए था।

यह कहना सरल है कि गांधारी अंधी थीं—लेकिन सच्चाई यह है कि उन्होंने स्वयं को अंधा बनाए रखा। यह आत्म-संयम था, लेकिन यह आत्म-सीमा भी थी।

गांधारी का मातृत्व त्यागी था, लेकिन सक्रिय नहीं। उन्होंने अपने पुत्रों को रोका नहीं, न ही मोड़ा। महाभारत यहीं एक कठोर प्रश्न उठाती है—क्या निष्पक्षता कभी-कभी कर्तव्य से पलायन बन जाती है?

धृतराष्ट्र के अंधेपन को साझा करने का निर्णय उन्हें पत्नी के रूप में महान बनाता है, लेकिन माँ के रूप में यह निर्णय जटिल हो जाता है। क्योंकि माँ को कभी-कभी पक्ष लेना पड़ता है—धर्म का।

गांधारी की सबसे बड़ी विफलता यह नहीं थी कि उनके पुत्र अधर्मी बने, बल्कि यह थी कि उन्होंने उन्हें समय रहते चुनौती नहीं दी।

महाभारत में जितना दोष दुर्योधन का है, उतना ही दोष उन मौन शक्तियों का भी है, जिन्होंने उसे रोका नहीं। गांधारी इसी मौन का सबसे शक्तिशाली प्रतीक हैं।

यह भाग हमें दिखाता है कि नैतिक तटस्थता भी कभी-कभी अन्याय को बढ़ावा देती है।

गांधारी का चरित्र इसलिए महान नहीं कि वह निर्दोष थीं, बल्कि इसलिए कि वह जटिल थीं—जहाँ त्याग और त्रुटि साथ-साथ चलते हैं।


कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका था। राजसिंहासन टूट चुके थे, वंश नष्ट हो चुका था, और गांधारी अब वह नहीं रहीं जो युद्ध से पहले थीं। यहीं से गांधारी का सबसे महत्वपूर्ण रूप सामने आता है—मौन से बाहर आती हुई गांधारी।

युद्ध से पहले गांधारी ने देखने से इंकार किया था। युद्ध के बाद वह देखना चाहती थीं—लेकिन अब देखने को कुछ बचा नहीं था। यही विडंबना महाभारत की सबसे कठोर नैतिक टिप्पणी बन जाती है।

जब गांधारी अपने मृत पुत्रों के बीच खड़ी होती हैं, तब पहली बार उनका मौन टूटता है। यह शोक का मौन नहीं, बल्कि निर्णय का क्षण है।

कृष्ण के सामने खड़ी गांधारी कोई विलाप नहीं करतीं। वह प्रश्न करती हैं—और प्रश्न ही उनका शस्त्र बन जाता है।

गांधारी का शाप भावनात्मक विस्फोट नहीं था। वह एक दीर्घकालिक नैतिक निर्णय था। यह उस मौन की अंतिम परिणति थी, जिसे उन्होंने वर्षों तक साधा था।

उन्होंने कृष्ण को दोष नहीं दिया कि युद्ध क्यों हुआ, बल्कि यह पूछा कि युद्ध को रोका क्यों नहीं गया। यही अंतर गांधारी को साधारण शोकग्रस्त माँ से ऊपर उठा देता है।

महाभारत यहीं स्पष्ट करती है कि गांधारी का अंधापन कभी कमजोरी नहीं था—लेकिन उनका मौन समय के साथ दायित्व बन गया था।

गांधारी का शाप धर्म के विरुद्ध नहीं था। वह धर्म के भीतर से निकला हुआ प्रश्न था—कि यदि सब कुछ जानते हुए भी हस्तक्षेप न किया जाए, तो क्या वह भी अपराध नहीं है?

यह शाप किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं था। यह उस व्यवस्था के लिए था, जिसने शक्ति, नीति और विवेक को अलग-अलग चलने दिया।

गांधारी यहाँ पहली बार सक्रिय होती हैं। उन्होंने युद्ध से पहले मौन चुना था, लेकिन युद्ध के बाद उन्होंने उत्तर चुना।

महाभारत में बहुत कम पात्र हैं जो अपनी सबसे बड़ी त्रुटि को स्वीकार करते हैं। गांधारी उनमें से एक हैं। उन्होंने अपने पुत्रों के पतन का दोष केवल दूसरों पर नहीं डाला—उनके मौन ने भी उसमें भूमिका निभाई थी।

यही कारण है कि गांधारी का शाप प्रतिशोध नहीं लगता—वह स्वीकारोक्ति लगता है।

महाभारत गांधारी को आदर्श नहीं बनाती। वह उन्हें चेतावनी बनाती है—कि नैतिक तटस्थता कभी-कभी सबसे खतरनाक पक्ष बन जाती है।

यदि गांधारी ने पहले देखा होता, तो शायद युद्ध टल जाता। यदि उन्होंने पहले बोला होता, तो शायद दुर्योधन रुक जाता। लेकिन इतिहास “यदि” से नहीं चलता।

गांधारी की सबसे बड़ी शक्ति उनका शाप नहीं था—उनकी आत्मस्वीकृति थी।

इस प्रकार गांधारी की आँखों पर पट्टी करुणा से शुरू होकर मौन बनी, और अंततः नैतिक निर्णय में परिवर्तित हुई।

महाभारत हमें यही सिखाती है—कि देखना ही पर्याप्त नहीं, सही समय पर बोलना भी उतना ही आवश्यक है।

और यही कारण है कि गांधारी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी—लेकिन अंततः महाभारत ने हमें देखने पर मजबूर कर दिया।


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