
हम रोज़ देखते हैं कि चीज़ें जल जाती हैं, टूट जाती हैं या गायब हो जाती हैं। लकड़ी जलकर राख बन जाती है, पानी भाप बन जाता है, और भोजन शरीर में जाकर समाप्त हो जाता है। लेकिन विज्ञान कहता है कि पदार्थ वास्तव में कभी नष्ट नहीं होता।
यह विचार पहली बार सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा प्राकृतिक नियम काम करता है। प्रकृति में द्रव्यमान का संरक्षण होता है। इसका अर्थ है कि किसी भी प्रक्रिया में पदार्थ केवल रूप बदलता है, समाप्त नहीं होता।
जब लकड़ी जलती है, तो वह हवा के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करती है। उसका ठोस रूप गैसों, धुएँ, राख और ऊष्मा में बदल जाता है। यदि इन सभी उत्पादों का कुल द्रव्यमान मापा जाए, तो वह मूल लकड़ी के द्रव्यमान के बराबर ही होता है।
यही सिद्धांत रसायन विज्ञान की नींव है। हर रासायनिक अभिक्रिया में परमाणु न तो बनते हैं और न ही नष्ट होते हैं। वे केवल नए संयोजन बनाते हैं।
इसलिए विज्ञान के लिए “नष्ट होना” केवल हमारी आँखों का भ्रम है। वास्तविकता में पदार्थ बस एक अवस्था से दूसरी अवस्था में चला जाता है।
इस Part 1 में हमने यह समझा कि पदार्थ के नष्ट न होने का मूल विचार क्या है। अगले भाग में हम जानेंगे कि परमाणु स्तर पर यह नियम कैसे काम करता है और ऊर्जा इसमें क्या भूमिका निभाती है।

जब हम पदार्थ को गहराई से देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि हर वस्तु परमाणुओं से बनी होती है। ये परमाणु किसी भी सामान्य रासायनिक प्रक्रिया में न तो बनते हैं और न ही नष्ट होते हैं। वे केवल नई व्यवस्थाओं में पुनः व्यवस्थित होते हैं।
उदाहरण के लिए, जब पानी उबलकर भाप बनता है, तो पानी के अणु समाप्त नहीं होते। वे बस तरल अवस्था से गैसीय अवस्था में चले जाते हैं। इसी तरह बर्फ पिघलती है, लेकिन उसके अणु वही रहते हैं।
रासायनिक अभिक्रियाओं में भी यही नियम लागू होता है। जब दो पदार्थ आपस में प्रतिक्रिया करते हैं, तो उनके परमाणु टूटकर नए यौगिक बनाते हैं। किसी भी परमाणु का अस्तित्व समाप्त नहीं होता।
इसी सिद्धांत को वैज्ञानिक भाषा में “द्रव्यमान संरक्षण का नियम” कहा जाता है। यह नियम बताता है कि किसी बंद प्रणाली में कुल द्रव्यमान हमेशा समान रहता है।
यही कारण है कि आग, सड़न, गलन या घुलना—ये सभी प्रक्रियाएँ पदार्थ के नष्ट होने का प्रमाण नहीं हैं, बल्कि उसके रूपांतरण के उदाहरण हैं।
इस Part 2 में हमने समझा कि परमाणु और रासायनिक स्तर पर पदार्थ क्यों कभी नष्ट नहीं होता। अगले भाग में हम जानेंगे कि परमाणु से भी गहरे स्तर पर—ऊर्जा और द्रव्यमान के संबंध में—यह नियम कैसे लागू होता है।

जब विज्ञान परमाणु से भी गहरे स्तर पर पहुँचा, तब यह स्पष्ट हुआ कि पदार्थ का “नष्ट न होना” केवल रासायनिक नियम नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का मूलभूत सिद्धांत है।
आधुनिक भौतिकी बताती है कि पदार्थ और ऊर्जा अलग-अलग नहीं हैं। आइंस्टीन के अनुसार द्रव्यमान स्वयं ऊर्जा का ही एक रूप है। इसका अर्थ यह हुआ कि पदार्थ कभी समाप्त नहीं होता, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार ऊर्जा में परिवर्तित हो सकता है।
परमाणु विखंडन और संलयन में यही नियम काम करता है। थोड़ी-सी द्रव्यमान की हानि ऊर्जा के रूप में बाहर आती है, लेकिन कुल वास्तविकता कभी घटती नहीं। ब्रह्मांड का संतुलन बना रहता है।
ब्लैक होल, तारों की मृत्यु, सुपरनोवा विस्फोट—इन सभी चरम घटनाओं में भी पदार्थ नष्ट नहीं होता। वह केवल ऐसे रूप में बदल जाता है जिसे समझने के लिए नई भौतिकी की आवश्यकता होती है।
इसीलिए आधुनिक विज्ञान अब “पदार्थ संरक्षण” की जगह “ऊर्जा-द्रव्यमान संरक्षण” की बात करता है। यह नियम कहता है कि ब्रह्मांड में कुल वास्तविकता हमेशा स्थिर रहती है।
यही कारण है कि पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता। वह केवल अपना स्वरूप बदलता है—कभी ठोस, कभी ऊर्जा, कभी प्रकाश, और कभी ऐसी अवस्था में जिसे हम अभी पूरी तरह समझ भी नहीं पाए हैं।
इस अंतिम भाग में हमने जाना कि पदार्थ का अमर होना कोई दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का सबसे गहरा वैज्ञानिक सत्य है।

